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सांस...

 अल्फाज़ ख़ामोश हुए, तुमसे कहने को कुछ न रहा, दिल के दर्द की अब आहट भी नही आती, आँख नम थी, नम ही रहीं, सांस पर अब भी शायद... सीने में कहीं चलती है। निरुपमा(24.8.21)

आंसू..,..

टपके थे बारिशों के बीच, कुछ बूंद मेरे गालों पर, ज़रा सा चख के देखा था, नमकीन सा तेरा प्यार, मेरी पलकों से हो के आया था।। निरुपमा(31.8.20)

कुछ भी नहीं ठहरता..,

 कुछ भी नहीं ठहरता, न दिन न रात, न हवा न पानी, न मौसम न बरसात, न खुशबू न रंग, न दर्द न घुटन, न प्यार न नफ़रत, न शिकवे न गिले, न ग़म न उदासी, न मौन न चीख, और जान...... हम भी कहां ठहरेंगे न तुम न हम। निरुपमा(27.8.20)

प्रेम

रोकने से कुछ ठहरता है क्या! जिस तरह बाँध को तोड़कर नदी की धारा , उसे पार करने के लिए , अपने सागर से मिलने के लिए , व्याकुल रहती है.. ठीक उसी तरह, प्रेम में दोनों ही विवश होते हैं , प्रेम को बाँधने की कोशिश करना, असहज , असंभव प्रयास है... निरुपमा ( 26.8.20)

तू..........

 इक तेरी गली को छोड़कर हर गली से मैं गुज़रती हूं। हर गली का आख़िरी मकां तेरा होता हैं। तेरी याद को छोड़कर, हर ख़याल पर मैं चलती हूं, हर ख़याल का आख़िर वो ख़याल तेरा होता है। तुझे भुलाकर हर सुबह बहुत दूर दौड़ आती हूं। हर दौड़ का आख़िरी पड़ाव तू ही होता है। निरुपमा (24.8.20)