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आलिंगन

कैसी मद्धम सी आवाज़ है। तुमने सुनी है?
शब्द नहीं दूर दूर तक कहीं।
बस दो आंखें, कभी निशब्द खड़ी एक दूसरे को तकती हुई।
कभी हल्की सी मुस्कुराहट होठों के कोनों में फैली हुई।
आलिंगन तुम्हारा, कभी झकझोरता भी है।
कभी तुम्हारे इतने करीब लिए आता है,
जैसे मैं तुम नहीं, बस तुम ही तुम हो, बस मैं ही मैं हूं।
सुनो ये जो हल्की सी लट मेरी पलकों पर आ गई  है, इसे ज़रा हटा दो।
और धर दो अपने दो होंठ मेरे होंठों पर,
पलकें बंद ही रहने दो,
बंद पलकों में जहां सारा नज़र आता है मुझे,
बंद पलकों में बस एक तू ही नज़र आता है मुझे।
.....निरुपमा(24.5.20)

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शायद ख़ुद की तलाश में।

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