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इश्क़ की शर्त ....

 दिल के टूटे की आवाज़ कहां होती है,
दिल मगर टूटे तो बहोत देर तलक रोता है,
कांंपने लगते हैं होंठ कुछ कहते नहीं,
और शिकन आंखो में फ़िर साफ़ नजर आता है,
एक छोड़ा हुआ होता है, दूजा छूटा हुआ,
दोनो के दिल से पर आह... एक निकलती है,
इश्क़ की शर्त है, रोना है, दर्द सहना है,
लाख रोको मगर इश्क़ कब ठहरता है।
निरुपमा (23.11.2023)

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लाज़मी नही कुछ भी....

लाज़मी नही कुछ भी.... न आरज़ू, न इश्क़, न छुअन, न चुभन। लाज़मी नही कुछ भी..... न तसव्वुर, न ख़्वाब, न थकन न टुटन। लाज़मी नही कुछ भी,  न तुम, न मैं, न वहशत, न तकमील। निरुपमा(18.01.2022)