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नील..

उसने किताब के पन्नो के बीच से गुलाब की कुछ सूखी पंखुड़िया निकाली, एक पुराना सिगरेट का डब्बा,
एक रुमाल, चॉकलेट्स के कुछ पुराने रैपेर्स, एक कलम टूटा हुआ और... 
और कुछ ख़त...
इन सब को इकठ्ठा कर वो उस से मिलने गयी,
और लिफाफा पकड़ाते हुए कहा,
“अब तुम्हारा कुछ भी नहीं जो मेरे पास रह गया हो,
अब जो है वो सीर्फ मेरा है”,
कुछ देर ठहर कर फ़िर उसने कहा...

“कितनी बेवकूफ थी न मैं, इन सब सामानों को इकठ्ठा करती रही,
तुम्हारे प्यार की निशानी समझती रही,
कि जबकि प्यार तुम्हे कभी था ही नहीं...
प्यार.. तुम्हे कभी हुआ ही नहीं,
खैर..
शिक़ायत तो अपनों से की जाती है, और तुम तो ग़ैर भी नहीं..
सुनो ..जब मेरी आँखें बंद होंगी, तब भी यदि तुम आये मेरी आखिरी झलक देखने,
तो ख़याल रहे तुम्हारी आँखें नम न हो, जिस समाज जिस दुनिया के लिए तुमने मुझे छोड़ा,
कहीं उनकी नज़र में तुम गुनहगार न बन जाओ..

‘नील के पिता का नाम .. आज भी कोई नहीं जानता’
अमन अपलक आस्था को देखता रहा, आस्था भारी क़दमों से सुनसान रस्ते पर नज़रें झुकाए जा रही थी....
...निरुपमा (17.6.19)



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