Skip to main content

सच.....

 एक चेहरे की तलाश ने

कितने चेहरों से रू - ब- रू करा दिया,

बस एक गलतफहमी,

और सारा सच सामने आ गया,

वो फरेब- ए- यार था,

दिलकश थी जिसकी हर अदा,

उस फरेब- ए- यार का,

हर सच सामने आ गया।

कितने सजदे, कितने वादे,

थे मेरे दिल ने किए,

इस नासमझ नादां का,

हर एक सच सामने आ गया।

कोई नहीं मैं उसकी, वो था नहीं कोई मेरा,

जिसके थे सब, उन सबों में कोई न थी मेरी जगह,

एक बात पर हर बात का सच सामने आ गया।

बस एक गलतफहमी,

और सारा सच सामने आ गया।।

निरुपमा (20.8.20)

Comments

Popular posts from this blog

शायद ख़ुद की तलाश में।

          आज फ़िर अकेलेपन ने घेर लिया मुझको, सांसों के लय में कोई समानता नहीं, इसके सुर-ताल बिगड़े हुए हैं। ये धड़कने मेरे कानों तक पहोचकर कोहराम मचाए हों जैसे। एक थकावट चारों ओर से घेरे हुए है, हाथ पैर हिलते नहीं, शरीर जैसे जड़ हुआ जाता है, नज़रें पहरों तक झुकी रहती हैं, एक टकटकी लगाए, पत्थर सी। मैं फ़िर से दौड़ना चाहती हूँ, हंसना चाहती हूँ, खिलखिलाना चाहती हूँ, पर अकेलापन मुझे और भी अधूरा किये जाता है। मालूम नहीं ये क्यूँ है! या शायद मालूम करना भी नहीं चाहती।               उम्र के हर दहलीज़ से गुज़र कर देखा, कई बार रस्ते बदलकर देखा, हर उम्र ने हर रस्ते ने मेरा हाथ थामकर कहा, थम जाओ ज़रा, ठहर कर देखो तो ज़रा ख़ुद को, क्या हाल कर लिया तुमने अपना। एक हल्की सी भीगी पलकों पर मुस्कान लिए, फ़िर से निकल पड़ती हूँ उस राह पर, जाने किसकी तलाश में, शायद ख़ुद की तलाश में।  निरुपमा (2/6/25) 

बही खाता खोल दूं मैं भी अपनी शिकायतों की, तो बोलो तुम क्या करोगे?

 बही खाता खोल दूं मैं भी अपनी शिकायतों की, तो बोलो तुम क्या करोगे? गुज़रे हुए लम्हों में जो बरसों की दफ्न यादें हैं, यादों में गहरे ज़ख्म हैं, ज़ख्मों पर परी परतें हैं। उन ज़ख्मों से परतों को गर हटा दूं, तो बोलो तुम क्या करोगे? बही खाता खोल दूं मैं भी अपनी शिकायतों की तो बोलो तुम क्या करोगे? तुमने मुझे छोड़ा था, मेरे सबसे बुरे वक्त में, जब तन्हाई बना साथी और आंसू बने श्रृंगार उस साथी उस श्रृंगार का तुमसे नाता जोड़ दूं, तो बोलो तुम क्या करोगे? बही खाता खोल दूं मैं भी अपनी शिकायतों की तो बोलो तुम क्या करोगे? निरुपमा (5.2.24)

लाज़मी नही कुछ भी....

लाज़मी नही कुछ भी.... न आरज़ू, न इश्क़, न छुअन, न चुभन। लाज़मी नही कुछ भी..... न तसव्वुर, न ख़्वाब, न थकन न टुटन। लाज़मी नही कुछ भी,  न तुम, न मैं, न वहशत, न तकमील। निरुपमा(18.01.2022)