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बस यूं ही.....

और चलते चलते कदम ठिठक कर ठहर जाते हैं, जैसे आवाज़ कोई सुनी हो तुम्हारी,  जैसे झलक दिख जाए कहीं।  जैसे शोर के बीच सुकून की वो निगाह पड़ी हो मुझपर,  जैसे हौले से हाथ पकड़कर मेरी पेशानी पर एक बोसा रखा हो तुमने। के जब कि मुझको भी ये ख़बर है के तुम नहीं हो, कहीं नहीं हो, पर ये दिल कह रहा है, तुम यहीं हो... यहीं कहीं हो।। निरुपमा (14.5.23)

फैसलों की घड़ी ...

बस, फैसलों की घड़ी थी अब, न वो मेरा था, न मैं ही राह में खड़ी थी अब। अब जो छूटा, सब छूटता चला गया, मैंने भी इस दिल की, कब सुनी थी अब। दिल को कुछ कहना था, कोई नाम गुनगुनाना तो था, दिल की ना सुनूंगी, इस बात पर मैं अड़ी थी अब। तन्हाई की राह, बेहद तन्हा.. बेहद मुश्किल थी मगर, बस इसी राह पर चलने की अपनी ठनी थी अब। निरुपमा (14.12.22)

एक मुलाक़ात ....

 न हाथ थामा, न नजरें मिलाई, न गिले किए, न शिकवे को दरकिनार किया। अपने-अपने अना की बात थी, वो भी ख़ामोश रहे हम भी खामोश रहे। निरुपमा (27.9.2022) अना (गुरूर) self respect...

माज़ी ....

 धीरे... और धीरे... दूरियां बढ़ती, और बढ़ती गईं... उसकी नज़र के धोके से और धोखे खाती रही। वक्त के मरहम भी अब काम आते नहीं। धीमे और धीमे फिसलता गया वक्त मेरे हाथ से। शांत अंतर्मन, चंचलता की पराकाष्ठा तक पहुंचा, फिर शांत और शांत हो गया। ये शांति चिटियों सी रेंगती मेरे हाथ पैर, कान, आंख से शरीर और शरीर से मन तक आ पहुंची। एक "हाय" की रट लगाता मेरा माज़ी, मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। मैने देखा उसको, माथे पर बोसे दिए,  और पानी में तैरते कागज़ के नाव की मानिंद हाथ फेरकर उसे रवाना किया। निरुपमा (13.9.2022 )

बात.....

 बात, जो निकली तुम से पहोची मुझ तक, उस पल सुना था सबकुछ.. सब ने, चेहरे ने, मुस्कुराहट ने, आंसुओं ने, जिस्म से रूह की परतों ने। मुस्कुराकर बस इतना ही कह सकी थी..... "ना.... तुम बोलो, मुझे बुरा नहीं लग रहा।"  पर वो शब्द float करते रहे बरसों, तुम्हारी आवाज़ गूंजती रही, मेरे कान से लहू निकलता रहा। निरुपमा(2.6.2022)