मेरी शायरी में अब गहराई नही होती,
दिल के सारे ज़ख़्म बासी पर गए हैं।
निरुपमा (28.4.24)
ज़िन्दगी के सफहों को पलटते हुए, कुछ ख़ास पल जैसे हाथ पकड़कर रोक लेना चाहते हैं!
मेरी शायरी में अब गहराई नही होती,
दिल के सारे ज़ख़्म बासी पर गए हैं।
निरुपमा (28.4.24)
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