Monday, August 11, 2014

हम......तुम

हसरतें... जो दिल मे ही रह गयी,
ख़याल... जो ज़हन से निकल न सके,
हम... जो आज भी हैराँ हैं तेरे जाने से,
और तुम... जो लौटकर फ़िर आ न सके।

ख़्वाब जो बारहाँ उगते रहे, पलते रहे,
फ़िर रहरहकर अपनी ही ड्योढी पर दम थोड़ते रहे,
हम.. जो हसरतों के सफ़हे बस यूंही पलटते रहे,
तुम...जो ख़्वाबों में भी हमसे मुह मोऱते रहे।

बस यूँही....


यूँही रुक रुक कर चलती रहीं सांसें अपनी,
यूँही थम थम कर वो नज़रें हमसे मिलाते रहे...

साथ साथ चलते रहे पर कब सहारे छूट गए,
रात तो चलती रही पर सारे तारे टूट गए,
जगमगाहट चाँदनी हर शाम बिखेरती तो थी,
देखते ही देखते क्यूँ काले बादल छा गए,

एक तनहा चाँद है अब, एक तनहा रात में,
एक तनहा मैं यहाँ हूँ दिल को थामे हाथ में,
डर तेरे जाने का था कल, आज कोई डर नहीं,
कल मेरा होता था सबकुछ, आज अपना कुछ नहीं

ये होंठ मुस्कुराते तो हैं, फिर भी खुशियों का इंतज़ार क्यूँ है इन्हें....

या मौला...ज़िन्दगी जीने की कुछ तो आसान शर्ते दे..............

कम साँसों के साथ ज़िन्दगी...आसन सी लगती है अब..................

हम दोनो का न मिलना ही अच्छा था, कि हमारे बीच कोई रिश्ता ज़िन्दा तो था।

नज़रें जाने क्यूँ पहरों चौखट पर टिकी रहती हैं,
न कोई ख्वाहिश, न कोई वादा और न हाथों में है अब लकीर कोई,
फिर भी ज़िन्दगी तुझ बिन इतनी अधूरी सी क्यूँ लगती है!

Saturday, June 28, 2014

एक बार फिर ...........

एक बार फिर थाम लो मेरी बाहें और ले चलो मुझे टेरेस पर कि देखेंगे हम साथ सावन की रिमझिम फुहारों को,

एक बार फिर थाम लो मुझे बाहों में और आ जाओ मेरे पास कि देखेंगे हम साथ चन्दा को सिमटते तारों में....

एक बार फिर छू लो मुझको दो आँखों से, और थाम लो मेरा हाथ, कि कटती नहीं अब ज़िन्दगी, न गुज़रे तनहा दिन रात,

एक बार फिर आ जाओ, एक बार फिर.....

फिर भी इंतज़ार ....क्यूँ?

उसने मेरे हाथ पैर बाँध दिए,
रख दिए शोले मेरी जुबां पर,
और धर दी चिंगारी मेरी आँखों में,
फिर पास आकर कहा,
“ये रिश्ता हमारा ऐसा, होगा किसी का न जैसा,
मैं फिर आऊंगा.....”
“मुझे आज भी उसका इंतज़ार है...क्यूँ??”

मैं और माज़ी

“इस जीवन का सबकुछ पीछे छुटता गया, और साथ रह गयी तो बस यादें...यादें कुछ तुमसे जुडी, कुछ सबसे जुडी, माँ, दीदी, बाबूजी सभी तो थे उन यादों में, जीते जागते, हँसते मुस्कुराते, पर मैं कहाँ थी? कहाँ थी मैं बोलो? जाने क्यूँ पर खुद को ही ढूंढ ही नहीं पायी... शेखर मेरे पास न आने वाला कल है, न गुज़रा हुआ कल...और अब तो ‘आज’ भी मेरा मेरे पास नहीं...सच....कितना अजीब है न...कभी कभी हम यादें संभालने में जीने का सलीका ही भूल जाते हैं, खुद को जाने कहाँ छोड़ आते हैं....इतना पीछे कि खुद को चाह कर भी ढूंढ नहीं पाते फिर!”

आरती खामोश थी, शेखर के मन में कई सवाल थे, पर पूछने की हिम्मत न जुटा सका...सवाल करता तो किस से करता आरती से? वक़्त से या नियति से? शेखर कार चलाता रहा और आरती... दूर डूबते सूरज के साथ कुछ और डूबती रही...

Wednesday, May 28, 2014

बचपन

वो दिन थे छुट्टियों के, जब हम उस तपती गर्मी में छत पर जाकर घरोंदे बनाया करते थे, दिन भर तपती गर्मी में रेत से सीपियाँ चुना करते, पकड़म पकड़ाई, विष अमृत, गिल्ली डंडे, पिट्टो, आँख मिचोली, पोषम पा, और कंचे खेला करते थे.... वो बचपन की नादान चालाकी भी अजब थी...गुड्डे गुड्डी के खेल में अक्सर गुड्डा मेरा होता, दीदी जो इतने नाजों से तैयार करती अपनी गुडिया को शादी के लिए, उसको मैं अपने गुड्डे से ब्याह कर अपने घरोंदे में रख लेती..और फिर अगली शादी में मेरा गुड्डा दीदी के घर में होता, इसबार गुडिया मेरी होती, और मैं शादी के बाद भी उसे विदा करने को तैयार न होती.........जितने ख़ास वो खेल होते, उतना ही ख़ास मेरा घर भी था, जहां पैसों की कमी तो थी, पर प्यार भरपूर था, माँ के सामने टेबल बजाकर खाना मांगना, कभी चमचे और थाली से साज़ की आवाज़ निकालना, और बाबूजी के आते ही, जोर जोर से रीडिंग डालना...अकेलापन किसी कहते हैं! ये तो शब्द भी सुना न था, बाबूजी डांटते तो माँ बचाती, माँ डांटती तो दीदी माँ से लड़ पड़ती... कितना सुखद था वो भोला सा बचपन, उनदिनों मोबाइल नहीं हुआ करते थे, इसीलिए मुलाकाते ज्यादा हुआ करती थी, टीवी भी हर घर में कहाँ थे, इसीलिए जिन दो चार घरों में टीवी हुआ करते थे उन्ही घरों में मोहल्ले के सारे लोग इकट्ठे होकर रामायण और महाभारत देखा करते थे, विक्रम बेताल की कहानियां और फिर फीचर फिल्म का इंतज़ार...और यदि इस बीच लाइट चली गयी तो दो पल का अफ़सोस फिर सब के ठहाकों की आवाजें, अँधेरे में कभी प्यास लग जाए तो माँ का पल्लू पकड़कर ही रूम तक जाना होता, क्या पता वो इमली के पेड़ वाला भूत खड़ा हो वहां,
अधखुली सी शाम में कुछ इशारे भी दिखा करते थे, वो भैया और वो दीदी जब भैया चश्में के अन्दर से दीदी को देखते और दीदी अपने दुपट्टे के कोर को पकड़ शर्माती, जब चाय की प्याली सबसे पहले उनके सामने लाने के बावजूद पहले सबको देकर फिर उनको देती, जब मुझसे कहती अपने भैया को जाकर ये रुमाल देना और कहना इसकी कढ़ाई मैंने खुद ही की है............मैं तपाक से कहती, तुम ही क्यूँ नहीं दे देती, भैया ही तो हैं...और वो डांट कर कहती ‘भैया वो तेरे हैं, मेरे नहीं!....’ मुझे कुछ भी समझ न आता....मैंने दीदी के आंसू निकलते हुए भी देखे थे उस रोज़ जब सब खुश थे, कि वो शादी में जा रहे हैं, और मैं खुश थी के मुझे नया लेहेंगा मिला है........ उनदिनों अमूमन लव मेरेज़ेज़ बहुत कम हुआ करते थे, और डाइवोर्स ना के बराबर....ज़िन्दगी आज़माने के लिए नहीं बल्कि जीने के लिए हुआ करती थी, चालीस की उम्र में माँ चालीस की ही नज़र आती थी, घर के काम माँ खुद ही किया करती थी, और बाबूजी का पेट तबतक न भरता जबतक वो माँ के हाथ का बना खाना न खाते....   
 
जूते के डिब्बे में रखा था कई बार अपनी गुडिया के उन कपड़ों को,
जो मुझको उतने ही प्यारे थे जितनी दीदी की वो नेट वाली पुरानी चुन्नी,
जिसे मैं अक्सर ओढ़ लिया करती थी अपनी हर ख़ूबसूरत फ्रॉक के साथ...
कई बार पहना था उसी चुन्नी को मैंने साड़ी की तरह,
और पूछा था माँ से ‘मैं कैसी लग रही हूँ,
माँ का जवाब हर बार एक सा होता, ‘दुल्हन लगती है मेरी बिटिया’,
और बाबूजी से कहती, ‘अब अपनी बिटिया के लिए दुल्हा ढूंढ ही लीजिये,
सारी  तैयारी तो इसने खुद ही कर ली, माँ की बात सुन मैं शर्मा जाती,
उम्र मात्र पांच साल थी तब....

Monday, May 19, 2014

आदत...........

मैं जानती हूँ कि तुम आज भी मुझे भूले नहीं, तुम्हे है याद वो हर ‘पल’ जब हम साथ हुआ करते थे, वो हर जगह जहां हम साथ जाया करते थे, आज भी तुम्हारी एक ‘आह’ सी निकलती है मुझे देखकर कि तुम आज भी सोचते हो तुम इतने अधूरे न होते गर हम साथ होते....आज भी तुम्हारे चेहरे पर पल भर के लिए ही सही एक ख़ुशी की लहर सी दौड़ जाती है जब तुम्हारी आँखें मेरी आँखों से टकराती है, आज भी तुम्हारे दिल के उस ख़ास हिस्से पर दर्ज है नाम मेरा.....तुम कहा करते थे, ‘चाँद.....तुम मेरी ज़रुरत हो, मेरी चाहत ही नहीं, तुम मेरी आदत हो’ और जब मैंने तुम्हारे होठों पर अपनी उंगलियाँ रख दी थी, और पूछा था ‘क्या तुम मुझे भी छोड़ दोगे जिस तरह तुमने सिगरेट छोड़ दिया’ मेरे इस सवाल का जवाब मैं हमेशा ‘ना’ में सुनना चाहती थी, और तुम्हारे जवाब मेरी छलकती हुई आँखों को कब मुस्कुराती आँखों में तब्दील कर देते पता ही न चलता...’तुम्हारा जवाब हर दफे एक ही होता, ‘चाँद सिगरेट मेरी बुरी आदत थी, और तुम मेरी वो आदत हो, जिसका इंतज़ार मैंने ताउम्र किया है, तुम्हारा साथ तो बस तभी छूट सकता है जब ये सांस टूट जाए’ तुम्हारी बातें मेरी सीने में हर दफे कुछ सांस भर जाती, तुमपर यकीन मेरे होने को सार्थक करता.....


पर शेखर, वक़्त कितनी तेज़ी से बदल जाता है न, अब मैं तुम्हारी आदत न रही, ज़रुरत भी न रही बस एक अधूरी ख्वाहिश हूँ. अब ज़रूरत तुम्हारी कोई और है, अब आदत तुम्हारी कोई और है, मैं जानती हूँ मेरे जाने का तुम्हे अफ़सोस तो है पर मेरे बगैर जीने की तुमने आदत डाल ली है, कैसा इक्तेफाक है न, अब हम साथ नहीं, पर सांस मेरी भी चल रही है, और तुम्हारी भी.......

Tuesday, May 13, 2014

बस एक प्याली सांस.....

दिल के अन्दर, बहुत अन्दर...बेहद तन्हाई है,
हर शाम की तरह, ये शाम भी सर झुकाए चली आई है,
रात गुजरने का, दिन के आने का इंतज़ार भला कब तक करें,
सुबह से शाम तक, शाम से सुबह तक, कहो कितना चलें,
फिर कोई वादे की लकीर इन हाथों में छोड़कर चले जाओ,

एक प्याली सांस मेरे सीने में फिर से भर जाओ..... 

तन्हाई - बेवजह

वो दिन भर खामोश रहती, कोई मुस्कुराता तो वो भी मुस्कुराती, कोई पूछता “कैसी हो” तो उसका जवाब हमेशा एक ही होता “अच्छी हूँ.....”,
पर शाम ढलते उसके चेहरे पर डर उभर आता, उसके कदम जैसे जैसे घर की ओर बढ़ते, वो डर बढ़ता जाता, घर पहुचकर मेज़ पर अपना पर्स रख, वहीँ चौखट पर बैठ जाती और घंटों कभी दीवार पर लटकी तसवीरें देखती, कभी सीलिंग से लटके पंखे को, कभी रसोईघर में जाती और जैसे ही बर्तन उठाती, उसे एक तेज़ चीख सुनाई देती, और उसके हाथ से बर्तन छूट जाता, वो अपने कान बंद कर लेती, वो आवाज़ और बढ़ जाती “छोड़ दो मुझे” मैं तुम्हे अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता, दम घुटता है मेरा इस घर में”
पर शेखर, हुआ क्या? क्या गलती हुई मुझसे? बोलो??
नफरत करता हूँ मैं तुमसे,
पर???
वजह बताना ज़रूरी नहीं समझता,
सुनो शेखर, हम सब फिर से शुरू करेंगे, तुम्हे मुझमें जो कुछ भी नापसंद है, मुझसे कहो, मैं छोड़ दूंगी, तुम जो चाहोगे वही करुँगी, प्लीज़ मुझे छोड़ कर मत जाओ......इन आवाजों का पीछा करते आरती दरवाज़े तक जाने कितनी ही बार गयी थी, पर कहीं कोई न था, न शेखर न उसके होने का आभास, ना उसके आने की उम्मीद, आरती के हाथ में थी तो बस गुज़रे लम्हों की बेहद बेचैन कर देनेवाली यादें......और बस एक सवाल.........................”क्यूँ?????”    

Friday, April 25, 2014

चंद अशआर

चंद रिश्तों के नाम नहीं हुआ करते,
उनके जुड़ने की पर चर्चा बहुत होती है..

मुझको मेरे घर का रस्ता बता ज़रा,
मैं खुद को शायद कहीं तुझमें भूल आई हूँ..

तुलना....

सुनो,
तुम मुझसे तुलना न करना,
अतुल्य हैं कई जीव इसी पृथ्वी पर....
इस सत्य को जानना ज़रूरी है, 
तुम्हारे परखने से, और मेरे हार मान लेने से,
मेरी हार नही है, 
मेरा जीवन नहीं तुम्हारी बनायी कसौटियों पर खड़ा उतरने के लिए,
कि मैं बनी हूँ इस पृथ्वी पर कुछ ऐसा करने के लिए जो अतुल्य है...
इसिलए तुम मुझसे तुलना न करना...

“बहुत हुआ रोना धोना.. अब हम मुस्कुराएंगे,
ज़िन्दगी गुजारते तो सब हैं...हम जीकर दिखाएंगे..”

बस यूँ ही.....

“वो एक-तरफ़ा थी याद,
या एक-तरफ़ा थी सोच,
वो एक-तरफ़ा था प्यार
या बेहद तनहा थे हम!”

चलो अच्छा हुआ जो तुमने भरम तोड़ दिया,
प्यार का और इरादों का क़सम तोड़ दिया,
नींद में चौंकते तो क्या होता,
जागती आँख में बसते थे जो ख्वाब तोड़ दिया,
गुज़रे लम्हों में सौंधी खुशबू सी जो मिलती रही,
जिनको दिन रात अपने गेसू में पिरोती रही,
वो जो एक सिलसिला था अपना उसे तोड़ दिया,
चलो अच्छा हुआ जो तुमने भरम तोड़ दिया,
प्यार का और इरादों का क़सम तोड़ दिया...

बस यूँ ही....

“ज़िन्दगी को समझने की कोशिशें ताउम्र हम करते रहे,
कभी ज़हरीला नाग और कभी सजा के नाम से पुकारते रहे,
जब मौत आई तो जाना ज़िन्दगी क्या है!”

ज़िन्दगी आसान है या मुश्किल. कैसे समझूँ मैं?
कैसे समझूँ कि अपनाया था जिन्हें अपने अपनों से बढ़कर,
बनाएं थे जो दिल के रिश्ते खून के रिश्तों से बढ़कर,
आज वही रिश्ते, मुझसे छूटें जाते हैं, 
दिल के बिखरे तारों के साथ आज ये बिखरे जाते हैं,
न सुकून है, न जुनू और न बची उम्मीद कोई,
फिर भी सब कहते हैं ‘कि समझो’ कहो कैसे समझूँ मैं??

Saturday, April 5, 2014

मेरी डायरी के पन्ने.........चंद ख्वाब

मेरा घर बहुत बड़ा था तब, मेरी उम्र बहुत छोटी थी जब, छोटे छोटे पैरों से आँगन में दौड़ती फिरती तब, जहां माँ सर पर आँचल लिए, साग चुना करती थी, उन दिनों मेरे घर में हमेशा हंसने की आवाजें आती, माँ, चाची, दादी, बुआ सब मिलकर आँगन में बैठे कभी अचार बनाती कभी पापड़ और कभी बड़े, मौसम जब गर्मियों का हो, तो अंगम रौशन रहता इनकी हंसी, और हम सब की चहकती आवाजों से, मेरे घर का एक भी शख्स ऐसा न था, जिसने मेरी माँ के हाथों के बुने स्वेटर न पहने हो, मुझे बाहर दोस्त बनाने की कभी ज़रुरत ही न पड़ी, छोटी चाची का बेटा मुझसे एक साल छोटा था, और काकी की दो बेटियाँ मुझसे एक और दो साल बड़ी, मेरे पास एक छोटी नन्ही गुडिया भी तो थी, जिसे माँ हॉस्पिटल से खरीद कर लायी थी, हाँ कई सालों तक तो मैं यही सोचती रही, फिर एक रोज़ बाबूजी ने बताया कि ये तुम्हारी छोटी बहन है, और इसके भी माँ बाबूजी हमदोनो ही हैं, बाबूजी की बात सुन पहली बार समझ में आया था के बड़ा होना किसे कहते हैं! उस रोज़ से गुडिया को नहलाने और तैयार करने की ज़िम्मेदारी मैंने उठा ली थी, उसके एक रोने से मुझे लगता कि क्या कर उसके चेहरे की हंसी वापस ले आऊं, उसका खिलखिलाता चेहरा मेरी ज़िन्दगी बन गया था, मुझे खुद की सुध न रहती एक उसकी हंसी के आगे मुझे कुछ न सूझता,  मुझे आज भी याद है माँ से चाची को कहते सूना था, ‘छोटी बहन के आने से तो अब बड़ी को अच्छा न लगता होगा? उसका प्यार जो बंट गया! तब माँ ने गर्व से कहा था, ना....मेरी अन्नू तो बस प्यार देना जानती है, पाने की तमन्ना इसने कभी की ही नहीं...” पर उस रोज़ मैं काफी देर तक यही सोचती रही, प्यार यदि सिर्फ दिया है मैंने, तो वो क्या था जिसे पाकर मैं इतनी खुश रहती हूँ....मुझसे ज्यादा देर इंतज़ार न हुआ. और जब बाबूजी आए तो मैंने झट से उनसे सवाल किया....मेरे सवाल सुन बाबूजी ने मुझे बहुत प्यार से अपनी गोद में बिठाया और जो कहा वो अब भी याद है मुझे “अन्नू, जो ख़ुशी देने में मिलती है वो पाने में कहाँ, तू इसीलिए खुश है, क्यूंकि तू देना सीख चुकी है, प्यार देना हमेशा और मेरी बिटिया बस तू ऐसी ही रहना.....”

बस यूँ ही...

गुज़रे लम्हों की तहरीर बनती रही,
खामोश सी मैं तस्वीर बनती रही,
धुंआ सा आँखों में दिन रात चुभता रहा,
उसके जाने से मैं और डूबती रही,
रात ख्वाबों में कटते रहे,
मैं बस इक तुझे सोचती रही,
नब्ज़ जब डूबने लगे मेरे,
तेरे होने की इक लकीर ढूंढती रही,
गुज़रे लम्हों की तहरीर बनती रही,

खामोश सी मैं तस्वीर बनती रही….

Friday, March 7, 2014

प्यार



दुनियावालों की तीखी नज़रों से छुपकर,
दिल की धडकनों को खुद में समेटकर,
नज़रों को नीची कर,
होंठों को भींच कर,
आँखों को मूंदकर,
खुद को रोककर,
बेपनाह टूटकर,
नन्हा सा प्यार तुम्हारा
मेरे दिल में पल रहा है....

Tuesday, March 4, 2014

बस यूँ ही...

वो करता रहा इंतज़ार वक़्त का...इश्क करने के लिए,
हम करते रहे इश्क...हर वक़्त हर पल में उस से,
वो कहता रहा वक़्त सिमित है जी भर के इश्क कर लो,
हम सोचते रहे वो पास है, वक़्त की किसे फिक्र है,
वो सोचता रहा हमसे मिलने के तरीके,
हम हर पल उसकी याद में उसी के साथ जीते रहे,
वो करता रहा शिकायत ज़िन्दगी से मुझे न पाने की,
मैं जीती रही उसी के लिए कि मेरी ज़िन्दगी उसी की अमानत थी..
वो रोता रहा मेरे ग़म में कि मैं बिछड़ जाउंगी उस से,
मैं हंसती रही कि मैं जानती थी ‘वो है तो मैं हूँ, वो नहीं, तो मैं भी नहीं...'

Thursday, February 20, 2014

क्या प्यार वक़्त के साथ मुरझा जाता है?

वो दोनों एक ही बेंच के दो किनारों पर बैठे अलग अलग दिशा में तक रहे थे, और सोच रहे थे कि पहल कौन करेगा! चुप्पी कौन तोड़ेगा? बैठे बैठे कितने मिनट कितने घंटे गुज़र गए कुछ पता ही न चला, यादों ने कब इंतज़ार की जगह ले ली पता ही न चला...पूरे पंद्रह साल पहले, शादी की पहली रात...जिस रात का इंतज़ार दोनों पूरे एक साल से कर रहे थे, बेसब्र थे, बेचैन थे, वो रात आई थी, दोनों खुश थे बेहद, चंदर दबे पाँव कमरे में आया और उसने दरवाज़ा अन्दर से बंद कर दिया, और झट से निशा के गोद में सर रखकर लेट गया, “निशा आज कितना सुकून है न! न कोई डर न किसी की परवाह, आज हमें किसी की तीखी नज़रे नहीं झेलनी पड़ेंगी, आज कोई हमपर ऊँगली नहीं उठाएगा, सच...बेहद अच्छा लग रहा है” दोनों की ज़िन्दगी सुकून के साए में चलने लगी..

शादी की बुनियाद प्यार थी, पर ये प्यार ये रिश्ता कब बस एक रस्म में तब्दील हो गया, ये दोनों समझ ही न सके, वक़्त गुजरता गया, पर निशा के पाँव भारी न हुए, निशा और चंदर के बीच कब एक अदृश्य दिवार खड़ी हो गयी, वो समझ न सके, निशा की कोख का सूनापन, चंदर और निशा के तकदीर को सूना कर गया....चंदर अब भी निशा से बेहद प्यार करता था, पर जब कभी वो निशा के नजदीक आने की कोशिश करता, निशा उस से और भी ज्यादा दूर चली जाती...वजह.. न वो कभी चंदर को बताती न खुद के सामने दोहराती....चंदर का टूटना उसे तोड़े जा रहा था पर एक असहाय, कमज़ोर इंसान की तरह वो चुपचाप देखती रही, कुछ भी न कर सकी, शायद उसने खुद को समझा लिया था, कि चंदर की ख़ुशी एक मासूम बच्चे में है और वो उसे नहीं दे सकती” निशा घर के बंद कमरों, दीवारों और जाने किन किन से बातें करती...पर चंदर से कहने के लिए हमेशा शब्द की कमी रहती...चंदर को ऑफिस की तरफ से पूरे एक साल के लिए अमेरिका जाना पड़ा, चंदर के जाने के बाद निशा ने संगीत सिखाने का काम शुरू किया, बच्चे अमूमन पांच से दस साल के बीच के होते, यहाँ निशा का मन लगने लगा, कभी महसूस ही न होता के उसकी अपनी कोई औलाद नहीं, हर सुबह निशा को शाम का इंतज़ार रहता, जब वो मासूम बच्चे उसने संगीत सिखने आएँगे, उनकी खिलखिलाहट के उजालों ने निशा की ज़िन्दगी को नयी रौशनी से नवाज़ा था, उसने मन ही मन खुद से वादा किया था, कि जब चंदर लौटकर आएगा तो उसे ढेर सारा प्यार दूंगी......आज वो दिन भी आ गया, चंदर आज लौट आया, पर अपने साथ एक कागज़ का टुकड़ा भी लिए आया, उस कागज़ के हिसाब से चंदर को परमानेंटली अमेरिका शिफ्ट होना था, और उसने निशा से साथ चलने की बात की, निशा जिसने अपने जीवन को नया आयाम दिया था, जो इन दिनों खुशियों के बगिया में खिलखिला रही थी, उसके जैसे होश उड़ गए परमानेंटली शिफ्ट होने वाली बात सुन के, निशा ने बहुत देर तक मनाया चंदर को, पर चंदर न माना, चंदर चला गया, निशा को तनहा छोड़, निशा उसे समझा भी न सकी कि ये सारे बाग़, ये साड़ी कलियाँ उसने चंदर के लिए ही तो पिरोये हैं, कि उससे उसकी उदासी देखि न जाती थी, पर वो खामोश रही, वजह...आज भी न कह सकी..

निशा माजी के गहरे समंदर में डूबती जा रही थी, कि अचानक उसकी नज़र बेंच के दूसरे किनारे पर परी, जो अब खाली थी...चंदर उठकर जा चुका था....न उसने पूछा न कुछ कहा, बस उठकर चला गया....निशा बोझिल नजरों से चंदर को जाते हुए देखती रही, और बस यही सोचती रही....”क्या प्यार वक़्त के साथ मुरझा जाता है?”

कभी छोटी सी मुलाक़ात कितना सुकून दे जाती है,
और कभी लम्बी सी रात आँखों की नींद ले जाती है..
कभी खामोश बैठे जाने कितनी बातें हुआ करती थी,

आज शब्दों में एहसासों की कमी सी लगती है..

Tuesday, February 18, 2014

जो एकतरफा हो..वो प्यार नहीं होता

“प्यार कभी एकतरफा नहीं होता,
और जो एकतरफा हो..वो प्यार नहीं होता”

अब कुछ भी होता नहीं पहले की तरह,
न उम्मीद बंधती है, न पलती है, न टूटती ही है,
तेरे जाने से मेरे दिन रात सुलझ गए हैं,
उधरी थी जो ज़िन्दगी वो फिर से बुन ली है मैंने,
चंद लकीरें हाथों की मिटने लगी थी, उन्हें रंगीन मेहन्दी से महका दिया है,
चंद ख्वाब आँखों के खोने लगे थे, उन्हें फिर से नज़रों में सजा लिया है,
तेरे सितम, तेरे करम, तुझको हो मुबारक,
मैंने जीने की नयी राह पा ली है,
कि मुझे इश्क हुआ है पहली दफा.....ज़िन्दगी से....खुद से...

सुनो,
रिश्तों को बंधनों में ही रहने दो,
खुल गए तो बावरा बनाएंगे तुम्हे,
दिन रात की सुध भुलाएंगे,
अपने पीछे नचाएंगे तुम्हे,
अब तो घर के हो, कल बेघर बनाएंगे तुम्हे,
बंधनों को तोड़कर कौन आजतक आज़ाद हुआ,
खुद की सुध रही नहीं, बेवजह फसाद हुआ,
रिश्तों को बन्धनों में ही रहने दो,
खुल गए तो बावरा बनाएंगे तुम्हे.....

Thursday, January 30, 2014

अफ़सोस



इस से पहले कि शेखर आरती से कुछ कह पाता, आरती उठकर वहां से चली गयी, सामने दूर तक सिर्फ अन्धेरा था, ये अन्धेरा कैसा कि जब की आज तो पूनम की रात थी, शायद ये अँधेरा आरती के मन का था, जो अब शेखर तक आ पंहुचा था, रात के कोई डेढ़ बज रहे थे, आरती भारी क़दमों से अपने घर की सीढ़िया चढ़ रही थी, घर जो कभी रौशन था शेखर की यादों से, उन चंद ख्वाबों से जो शेखर और आरती ने साथ देखे थे, पर अब यहाँ ‘बासी’ सच्चाई बस्ती थी, ‘सच जो बेहद कड़वा था, आरती के वो आखिरी शब्द शेखर के कानों में गूंजते रहे, ‘हमारा प्यार पवित्र था शेखर, पर तुम्हारे जाने के बाद उस शख्स का मुझे छूना, ऐसा लगता है जैसे मैं अपवित्र हो गयी हूँ, वो मेरा पति नहीं, उसने बस सिन्दूर लगाया था मुझे, उसने मुझे इस्तेमाल करने का सामान मात्र समझा, क्या शादी इसे कहते हैं बोलो? मैं शादी नहीं करना चाहती थी, तुम जानते थे, पर सिर्फ तुम्हारी खातिर की, कि तुम्हे ख़ुशी मिलेगी, पर ये क्या हुआ? इस शादी से न तुम खुश हो सके न मैं! उसने मेरे हर ख्वाब के चीथरे उड़ा दिए, उसने मुझे समझाया कि मैं साथ, ख़ुशी, मुस्कराहट इनमें से कुछ भी डीजर्व नहीं करती, यदि कुछ डीजर्व करती हूँ तो वो है, दर्द, आंसू, तकलीफ, तन्हाई, मैंने खुद को भुला दिया था, ये सोचना छोड़ दिया था, कि मैं कितनी तनहा हूँ, कि दर्द कितना है, कहाँ है? हर इलज़ाम वक़्त के सर मढ़ कर खुश होने की कोशिश कर रही थी, ‘ख़ुशी’ जिसका अर्थ अब मात्र चेहरे की मुस्कान है, जो तबतक बनी रहती है जबतक कोई सामने हो......

कभी सोचा है कैसा लगता होगा शाम ढले उस रस्ते पर चलना जिस रस्ते पर चलकर आप कभी अपने घर को जाया करते थे, अब लिए जाती है वही सड़क एक मकान की ओर, खाली बंजर सी शाम को उसी मकान में दाखिल होते, जहां अपनी ही खामोशी गूंजती हो चारों ओर....रात मुह खोले इंतज़ार कर रहा  हो कि कब आए वो और बाँध लूँ मैं उसकी साँसों को अपनी मुट्ठी में, कि कब दिख जाए उसकी वो ग़मगीन उदास आँखें और उड़ेल दूँ मैं उसकी यादें उसकी आँखों से, हर शाम ऐसी ही कटती है, पर फिर भी मैंने तुमको खुद से दूर रखा, तुम्हे अपनी हालत का अंदाजा न लगने दूँ यही कोशिश की, मैंने सोचा था, दोनों के दर्द में रहने से बेहतर है के तुम खुश रहो, खुश रहो इस सोच के साथ कि मैं खुश हूँ पर आज वो पर्दा भी जाता रहा.....आज सारे भरम टूट गए’

आरती की कही हर बात शेखर के कानों में गूंजती रही, वो मोड़ देना चाहता था हवा के रुख को, खींच लाना चाहता था गुज़रे हर वक़्त को, वो वक़्त जब आरती बात बात पर खिलखिला कर हंसती थी, बात बात पर मज़ाक करती थी, हर आने जाने वालों को जबतक जरा छेड़ न ले तबतक दम नहीं लेती थी, वो मिटा देना चाहता था उस शख्स की हर स्मृति को आरती के मन से जिसने आरती को कई टुकड़ों में तोड़ दिया था, शेखर अपनी आरती वापस चाहता था, वापस उसी रूप में, पर शायद अब ये मुमकिन न था..................