Monday, September 14, 2015

तन्हाई............फिर आएगा......

कितना भयानक रूप है इस ‘तन्हाई’ का, इसकी बांहें कितनी मजबूत हैं,
इसकी आँखें लाल हैं, दांत नुकीले,
ये जकड़े जाती हैं मुझे और..कुछ और ज़ोर से,
मैं डरती हूँ, भागती हूँ, दौड़ती हूँ, छिपती हूँ,
कभी बंद करती हूँ आंखें, कभी खोल देती हूँ,
रूकती हूँ, मुरती हूँ, अपनी हथेली से चेहरे को छिपाती हूँ,
सोचती हूँ, क्या ‘वो’ अब भी मेरे पीछे पड़ा होगा,
मैं भागती हूँ एक बार फिर बिना रुके,
बिना देखे इधर-उधर, दौड़ते-दौड़ते कुछ पल ठहर कर खुद को देखती हूँ,
और पाती हूँ खुद को, सुनसान रास्तों पर, बेनाम मंजिल पर,
मैं थक कर बैठ जाती हूँ, मेरा सारा शरीर टूट चूका है, अब मुझमे कुछ भी शेष नही,
उसकी दो आँखें अब भी मुझपर टिकी हैं, वो इसी मौके की तलाश में था,
उसके बांह मुझको अजगर की तरह बाँध लेती है,
मैं रोती हूँ, चीखती हूँ, हाथ पैर मारती हूँ, तड़पती हूँ,
मेरा देह ठंडा होता जाता है, सांस अब भी चलती रहती है,
फिर अचानक ही छोड़ देता है वो मुझे एक बार फिर,
चंद रोज़ के लिए, खुद के वजूद को समेटने के लिए,
छोड़ देता है मुझे, ये समझने के लिए कि वो फिर आएगा,
खुशियों से दूर, ग़मों के सागर में ले जाएगा,

तन्हाई............फिर आएगा......

Monday, August 17, 2015

एक सवाल-आज़ाद देश से

हम मानते रहे ‘धरती’ को माँ, ‘भारत’ को माँ, नदियों को माँ,
पर ‘बहन’ का दर्जा शायद किसी को नहीं दिया!
तभी तो सड़क पर चलते हुए, आये दिन जूझती है हर बहन,
झेलती है इन रावणों को, जिनके चेहरे पर लिखा कुछ नहीं होता,
दो हाथ, दो पैर, दो आँखें और जुबां भी बस एक ही होती है,
पर इस जुबां से निकलते हैं ऐसे शब्द जो भेद देते हैं इन कानों को,
वो आँखें, वो दो आँखें.. जब देखती हैं इन बहनों को, छिल जाती है रूह
जिस्म के अन्दर बहुत अन्दर ठेस लगती है इस दिल को,
फिर सोचती हैं बहने कि क्यूँ लिया जन्म इस देश में! क्यूँ हुई पैदा इस धरती पर!
क्यूँ रोक नहीं पायी खुद को उस पल में, उस हर पल में जब बाबूजी बोला करते थे,
ये देश हमारा है बिटिया, हर पुरुष हर स्त्री की रक्षा के लिए जन्म लेता है,
भाई बहन का रिश्ता ‘राखी’ का मोहताज नहीं होता,
तू देखना एक रोज़ तू भी समझेगी, कि रिश्ते बस मानने से बनते हैं,
निभाने से निभते हैं, इस देश में कोई दूजा नहीं, सब अपने हैं....

बाबूजी उस उम्र में भी सच्चाइयों से अनिभिज्ञ थे, या मैंने इस उम्र में ही देख लिया असली चेहरा,
असली चेहरा इस देश का, इस आज़ाद देश के आज़ाद ख्यालों वाले पुरुषों का,
नहीं ये पुरुष किसी बड़े माँ बाप के बिगड़े बेटे नहीं, ये बेटे हैं किसी गरीब के, कोई गरीब जो मुश्किल से जोड़ता है रोटियाँ घर की, उनके बेटे सड़क पर चलते हुए कभी छेड़ते हैं किसी बच्ची को, कभी किसी महिला को तो कभी किसी बुज़ुर्ग को, कभी गालियों की वर्षा करते हैं, कभी मारते हैं कंकर और खुश होते हैं इन बहनों की तकलीफ में, बेहद अफ़सोस की बात है, जहां एक ओर हम यहाँ देश की आज़ादी की वर्षगाँठ मना रहे थे, वही दूसरी ओर ये लड़के जो आने वाले वक़्त में इस देश के भविष्य को लिखनेवाले हैं, वो लड़कियों को परेशान कर रहे थे, इन्हें मालूम है के इन्हें कोई कुछ नहीं करेगा, पुलिस वाले दो दिन के लिए जेल में डालेंगे फिर पैसे लेकर छोड़ देंगे, हमारे देश का क़ानून जो रोज़ हल्ला करता है कि इस देश में बेटियों के लिए कड़ी सुरक्षा के प्रबंध हैं, उस कानून से और इस समाज के ठेकेदारों से मेरा बस यही एक सवाल है कि ‘क्या वाकई में हम सुरक्षित हैं????’  

Friday, July 31, 2015

बस यूँ ही...

खामोश ज़िन्दगी है अल्फ़ाज़ चाहिए, 
मुझको मेरे ग़मों से निजात चाहिए..

Thursday, July 30, 2015

गुज़र गयीं

गुज़र गए हैं दिन सारे, गुज़र गयीं वो रातें भी,
गुज़र गयीं वो अनछुई शामों की मुलाकातें भी,
गुज़र गया हर एक  लम्हा जिनमें थी चंद बातें भी,
गुज़र गयी हर एक यादें जिनमें थी चंद सांसें भी......

Friday, May 8, 2015

इश्क मेरा...तेरे दिल से मिट गया कैसे??

ज़िन्दगी को पर लग गए हो जैसे, उड़ चली वो वक़्त के हर दहलीज़ को लांघते,
मेरा बिखड़ा वजूद आज भी बिखड़ा पड़ा है, वहीँ, ठीक वहीँ तेरी चौखट पर,
तू आता है, मुझे देखता है, पर सोचता नहीं, एक तस्वीर हूँ शायद, या शायाद कोई साया हूँ,
तू आज भी मुझमें जिंदा है, पर तुझमें मैं कहाँ हूँ! वो जो एक रोज़ तूने आवाज़ मुझको लगाईं थी,
उस आवाज़ की शिकन मेरे कानों में चुभने लगी है, तू है मेरे ही आसपास कहीं आज भी,
पर तुझे छूने की नाकाम कोशिशों से अब दिल, ऊबने लगा है, थकने लगा है, टूटने लगा है,
कि सोचती हूँ तुझको, तो कभी खुद को भी सोच लेती हूँ, तू कौन है मेरा, मैं कौन हूँ खुद की!
दर्द तेरा जो मेरी आँखों में उभर आता था, इश्क मेरा...तेरे दिल से मिट गया कैसे??

Wednesday, March 18, 2015

बस यूँ ही.....

1.
“हज़ारों ख्वाब देख डाले मेरी आँखों ने, 
उस रोज़ जब तूने कहा,

‘मैं फिर आऊंगा’”

2.
"अधूरे ख्वाबों की दहलीज़ पर खड़ा,
आज भी मेरी राह तकता होगा,
दिन की सुध होगी कहाँ उसको,
रात भी जागते काटता होगा,

नर्म होठों की सलवटें, चाँद आँखों की शिक़न,
दर्द में डूबी वो आहें, रात भर मुझको पुकारती होंगी,
आज भी उसकी दो निगाहें,
बेवजह मुझको तलाशती होंगी...."

Tuesday, March 3, 2015

चलो खामोशी की सब दीवार तोड़ते हैं........

चलो खामोशी की सब दीवार तोड़ते हैं,
तुम हमसे कहो, हम तुमसे बोलते हैं,
दिल से ज़ख्म, ज़ख्म से दर्द का सफ़र बहुत हुआ,
आज मरहम की कुछ बात बोलते हैं,
तुम हमसे कहो, हम तुमसे बोलते हैं,
चलो खामोशी की सब दीवार तोड़ते हैं...

सूना है दिल के ज़ख्म यूँ भरा नहीं करते,
ग़म की रात में, ख्वाब बुना नहीं करते,
पाँव में बेड़ी हो, होठों पर ताले,
तो नए रिश्ते यूँही चुना नहीं करते,

स्याह रातों का सफ़र बहुत हुआ,
बंद दरवाज़ों का, खामोश आवाजों का,
तनहा ज़िन्दगी का सफ़र बहुत हुआ,
आज माजी की हर परत खोलते हैं,
तुम हमसे कहो, हम तुमसे बोलते हैं,

चलो खामोशी की सब दीवार तोड़ते हैं...

माज़ी के सफ़हे...

मुझे अंदाजा न था शेखर कि तुम्हारे जाने से मेरी ज़िन्दगी तार तार हो जाएगी, मुझमें जीने की उम्मीद न रहेगी, मरने का हौसला न रहेगा, हंसूंगी तो कुछ इस तरह कि जैसे एहसान किये जाती हूँ खुद पर, रोउंगी तो गले से आवाज़ न निकलेगी, सोचूंगी तो पहरों माजी में तफरीह करती रहूंगी, और लौटना चाहूँ भी तो लौट न सकुंगी, कि तुम सामने तो होगे, पर तुम मेरे ना होगे...सच कहूँ तो तुम्हारी चाँदनी में अब हौसला नहीं कि लड़ सके इस जहां से, लोगों की तंज निगाहों को सह सके, सुन सके गालियाँ, और फिर भी रखें उम्मीद को जिंदा कि एक दिन तुम मेरे होओगे, एक दिन हम साथ होंगे, याद है शेखर शादी के बाद जब मैंने तुमसे बेटे की मांग की थी, तो तुमने क्या कहा था? तुमने हँसते हुए कहा था कि “चाँद, ये शादी अभी दुनिया के सामने नहीं आयी, अभी से ये ख्यालों के महल बनाना शुरू न करो, तो मैंने कहा था, मैं तुम्हारे लिए इस दुनिया से लड़ सकती हूँ, कि मेरी दुनिया सिर्फ तुमसे है....तुमने हर बार की तरह सिर्फ मुस्कुरा भर दिया था, और छोड़ गए थे मेरे चेहरे पर अपनी दो आँखें, वो शरारती आँखें, जिनके आगे भी कुछ है, मैंने कभी सोचा ही नहीं..........

Monday, January 19, 2015

कुछ भी नहीं.

कहीं नहीं, कोई नहीं, कोई भी नहीं,
दिल के पास नहीं, और दिल से दूर नहीं,
मेरा वजूद एक सवाल बन गया अब तो,
मेरा ही ‘आप’ अब मेरे आसपास नहीं,

रहा न दिल, न दर्द, अब तो दिलरुबा भी नहीं,
गयी ज़बान भी, कोई हमज़बां भी नहीं,

लब हैं खामोश, दिल हज़ारों बातें करता है,
तू नहीं मेरा, अब मेरा ये जहां भी नहीं,

राह में तनहा मुझे कुछ इस तरह वो छोड़ गया,
जैसे उसका मेरा अब कोई भी रिश्ता ही नहीं...