Wednesday, February 14, 2018

‘प्यार’-एक्सपायरी डेट


साल दर साल गुज़रते रहे,
वक़्त…...परत दर परत चढ़ाता रहा,
तुम्हे याद करना..मेरी आदत बन गयी,
तुम्हे सोचना...मेरी फ़ितरत,
हर कसमें, हर वादे तुम भूल गए,
सिर्फ़ एक फ़ैसला तुम्हारा, सब ख़त्म कर गया,
उन तीन शब्दों को सहारा मानकर,
मैं चलती रही, गिरती रही, संभलती रही,
मैं गुज़रे कल में जीती रही, और तुम…… आज में,
क्या प्यार भी एक्सपायरी डेट के साथ पैदा होता है जाना’?

Wednesday, January 24, 2018

जाना है, कहीं दूर बहोत दूर मुझे जाना है....

जाना है, कहीं दूर बहोत दूर मुझे जाना है....
छुट्टियां हर उस शख्स से जो मेरे आसपास है,
छुट्टियां हर उस वक़्त से...जो गुज़रता ही नहीं,
दर्द है, फ़रियाद है, गुम हुई आवाज़ है,
मेरा अपना कुछ भी नहीं..बस माज़ी मेरे पास है,
जाना है कुछ इस तरह, के लौटने की तारीख नहीं,
हर पल हर दिन लहरों के साथ बहना है,
चाँद के साथ निकलना और सूरज के साथ डूबना है,
देखना है बहोत देर तलक पंछियों को चहचहाते हुए,
देखना है उस माली को फूलों से काटें निकालते हुए,
मुझे अब और नहीं रहना इस शहर में,
सब बहरूपिये हैं, एक शक्ल पर कई शक्लें लगा रक्खी हैं....

जाना है, कहीं दूर बहोत दूर मुझे जाना है....

Tuesday, January 16, 2018

प्यार

सबकुछ अपना ही है?
कुछ बदला तो नहीं!
उसकी आवाज़ में एक अनजानापन,
उसकी आँखों में वो बेरुखी,
उसके होठों पर किसी और का ज़िक्र,
फिर भी कहता है, मुझको तुमसे प्यार है

उसकी आवाज़ से दिल और धडकता नहीं मेरा,
उसके इंतज़ार में, बेचैनी मेरी और बढ़ती नहीं,
मेरी आँखों में ख्वाब तो अब भी आते हैं,
पर खवाबों में वो आता नहीं,
न हैरत होती है मुझे उसके बेगानेपन से,
न नज़रे झुकती है मेरी, उसके अब छुअन से,

फिर भी कहती हूँ, मुझको तुमसे प्यार है

https://www.youtube.com/watch?v=eIQRdimcqrw

इश्क एक फ़ितूर हैं दिमाग का

सब बेवजह की बातें हैं,
सब बेवजह के फ़रियाद,
मैं तुम्हारी, तुम मेरे...
दिल को बहलाने के बहाने हैं,
ज़िन्दगी की सच्चियां कुछ और ही हैं,
ज़िन्दगी की रुस्वाइयां कुछ और ही हैं,
न ग़म में कोई साथ है, न ख़ुशी में,
इश्क बस एक फ़ितूर हैं दिमाग का,

इस से ज्यादा कुछ भी नहीं,

Thursday, July 27, 2017

बस यूँही

जिन लकीरों पर तुम्हारा नाम लिखा था,
वो लकीरें अब घिसने लगी हैं,
ज़िन्दगी एक लम्बी उम्र तय कर,
जाने कहाँ पहोच गयी है,
तुम्हारा साथ एक सपना सा लगता है अब तो,
तुम्हारी याद, जैसे पिछले जनम से कोई आवाज़ देता हो,
क्या हम तुम वाकई एक दुसरे के लिए बने थे!

Thursday, July 13, 2017

तुम...और तुम्हारी मैं...

वो अपनी नज़रों से दुनिया देखना चाहता था..
मैं उसकी नज़रों से, 
वो चाँद, तारों का साथ चाहता था,
मैं.... उसका,
वो ज़िन्दगी की हक़ीक़तों से मुझे रु-ब-रु कराना चाहता था,
मैं जीवन भर उसके ख्वाब देखना चाहती थी,
वो मेरे साथ होकर भी मेरा न था,
मैं उस से दूर जाकर भी उसकी ही रही...

सटीक अपनी जगह पर,

सबकुछ कितना अजीब है न! एक ज़माने में जिससे दोस्ती थी, फिर प्यार हुआ..फिर नफ़रत ....
वो सब बदल कर आज सीर्फ ‘जान पहचान’ रह गयी है....
ये जान पहचान का रिश्ता कितना अजीब होता है न, 
न उम्मीदें होती हैं, न दर्द ...
न कोई डर किसी को खोने का, न कोई ख़ुशी किसी को पाने की..
रिश्ता न कमज़ोर होता है, न मजबूत ही....
पर फिर भी कुछ रह जाता है..
वही रह गया हमारे बीच भी, तुम भी बदल गए, और हम भी...
अब मुझे चोट लगे तो तुहारे मुह से आह नहीं निकलती, 
और तुम्हे दर्द हो तो मेरी नींदें नहीं उडती.....
सब ठीक है अब...सटीक अपनी जगह पर,...

Tuesday, July 4, 2017

बदला कुछ है शायद हमारे दरमियाँ .....

कितना अजीब वो पल होता है न ..
जब दिल में अनगिनत बातें भरी हो..और जुबां खामोश हो,
वो  पल कितना भारी होता है,
जब होंठ तो हिले, पर शब्द बेज़ुबान हो जाए,
आँखों में उम्मीदें हो, और कान सुनने को तरसते हो जिसकी आवाज़,
उसी से बात करते-करते, उसी की बात सुनते-सुनते,
बस अचानक ही लगे,
कि “अब कुछ मत कहो...शायद और सुन ना पाऊं...”
जिसे पाने की आरज़ू ताउम्र खुद में लिए फिरते हैं,
जिसकी सूरत, हर सूरत में तलाश करते हैं,
जिसकी खामोशी भी एक गूँज बनकर, कहीं कानों में बसा करती है,
उसी के साथ चलते चलते, कभी ऐसा भी होता है,
कि वो तो होता है...पर वो कहीं नहीं होता...


Wednesday, June 7, 2017

शब्द

कुछ शब्दों के भेद इतने गहरे होते हैं,
कि माफ़ी मांगने से भी उनकी चुभन नहीं जाती,
और माफ़ कर देने से भी, उनकी घुटन नहीं जाती......



Monday, May 15, 2017

नाउम्मीदी

एहसास मर जाते हैं,
ख़त्म हो जाते हैं,
दफ्न हो जाते हैं
जब एहसासों पर चढ़ जाती है परत,
इंतज़ार की,
अकेलेपन की,

नाउम्मीदी की....


नाउम्मीदी, नाकामी से बड़ी होती है, नाउम्मीदी, एक गहरी खाई है, 
उसके आगे कुछ भी नहीं, वो आखिरी पड़ाव है...