Thursday, July 13, 2017

तुम...और तुम्हारी मैं...

वो अपनी नज़रों से दुनिया देखना चाहता था..
मैं उसकी नज़रों से, 
वो चाँद, तारों का साथ चाहता था,
मैं.... उसका,
वो ज़िन्दगी की हक़ीक़तों से मुझे रु-ब-रु कराना चाहता था,
मैं जीवन भर उसके ख्वाब देखना चाहती थी,
वो मेरे साथ होकर भी मेरा न था,
मैं उस से दूर जाकर भी उसकी ही रही...

सटीक अपनी जगह पर,

सबकुछ कितना अजीब है न! एक ज़माने में जिससे दोस्ती थी, फिर प्यार हुआ..फिर नफ़रत ....
वो सब बदल कर आज सीर्फ ‘जान पहचान’ रह गयी है....
ये जान पहचान का रिश्ता कितना अजीब होता है न, 
न उम्मीदें होती हैं, न दर्द ...
न कोई डर किसी को खोने का, न कोई ख़ुशी किसी को पाने की..
रिश्ता न कमज़ोर होता है, न मजबूत ही....
पर फिर भी कुछ रह जाता है..
वही रह गया हमारे बीच भी, तुम भी बदल गए, और हम भी...
अब मुझे चोट लगे तो तुहारे मुह से आह नहीं निकलती, 
और तुम्हे दर्द हो तो मेरी नींदें नहीं उडती.....
सब ठीक है अब...सटीक अपनी जगह पर,...

Tuesday, July 4, 2017

बदला कुछ है शायद हमारे दरमियाँ .....

कितना अजीब वो पल होता है न ..
जब दिल में अनगिनत बातें भरी हो..और जुबां खामोश हो,
वो  पल कितना भारी होता है,
जब होंठ तो हिले, पर शब्द बेज़ुबान हो जाए,
आँखों में उम्मीदें हो, और कान सुनने को तरसते हो जिसकी आवाज़,
उसी से बात करते-करते, उसी की बात सुनते-सुनते,
बस अचानक ही लगे,
कि “अब कुछ मत कहो...शायद और सुन ना पाऊं...”
जिसे पाने की आरज़ू ताउम्र खुद में लिए फिरते हैं,
जिसकी सूरत, हर सूरत में तलाश करते हैं,
जिसकी खामोशी भी एक गूँज बनकर, कहीं कानों में बसा करती है,
उसी के साथ चलते चलते, कभी ऐसा भी होता है,
कि वो तो होता है...पर वो कहीं नहीं होता...


Wednesday, June 7, 2017

शब्द

कुछ शब्दों के भेद इतने गहरे होते हैं,
कि माफ़ी मांगने से भी उनकी चुभन नहीं जाती,
और माफ़ कर देने से भी, उनकी घुटन नहीं जाती......



Monday, May 15, 2017

नाउम्मीदी

एहसास मर जाते हैं,
ख़त्म हो जाते हैं,
दफ्न हो जाते हैं
जब एहसासों पर चढ़ जाती है परत,
इंतज़ार की,
अकेलेपन की,

नाउम्मीदी की....


नाउम्मीदी, नाकामी से बड़ी होती है, नाउम्मीदी, एक गहरी खाई है, 
उसके आगे कुछ भी नहीं, वो आखिरी पड़ाव है...

Monday, March 27, 2017

आज वो कोई नहीं मेरा, और मैं नहीं उसकी..

आज वो कोई नहीं मेरा, और मैं नहीं उसकी,
अपनी हर सांस जो, मेरी साँसों से बांधे रखता था,
अपनी परछाई से ज़्यादा, जो मुझको पास रखता था,
एक भी पल मुझ बिन, सदियों सी जिसको लगती थी,
वो जो कहता था, कि एक तुम हो और कोई नहीं..
आज वो कोई नहीं मेरा, और मैं नहीं उसकी..

उसकी एक आवाज़, मेरी रूह को छू जाती थी,
उसकी आँखों की तपीश, मेरे जिस्म को  पिघलाती थी,
उसके होंठों पर एक मुस्कान सजाने के लिए,
मैं कभी खुद ही उसकी तकदीर से लड़ जाती थी..

आज वो कोई नहीं मेरा, और मैं नहीं उसकी..

Thursday, March 9, 2017

बस यूँही...

"तुम क्या फ़िरे अपनी ज़ुबान से,
ज़िन्दगी से भरोसा उठ गया......"

"गुज़रे हर अफ़सोस पर ये अफ़सोस भरी परा,
तुम्हारी याद बाकी थी, उस से भी हाथ धोना पड़ा...."

"कुछ पल खामोशियों के बीच गुज़री,
कुछ पल तन्हाइयों के बीच गुज़री,
गुज़री तो कई शाम यूँ भी मगर,
वो शाम तेरे साथ.....तेरे बगैर गुज़री ...."


Saturday, February 18, 2017

धूप

एक ज़रा सी धूप मेरे घर भी भेजना,
सूना है सूरज आजकल तुम्हारे घर से निकलता है,..

Tuesday, January 10, 2017

बस यूँही..

बन गया बहाना ‘तेरी बेरुखी’

वरना रोने को कबसे बेकरार थे हम...

Wednesday, September 21, 2016

उम्मीद

दर्द तो दिल में था,
ये आँख मेरी भर आई क्यूँ,
मुद्दतें गुजरी अब तो,

न वो आया न उम्मीद गईं