Monday, May 16, 2011

कैसे

अपने ख्वाबों की हकीक़त हम बताएं कैसे,
रूठे रूठे से तुम हो हम मनाये कैसे,
मेरी आवाज़ की लर्जिश पे करम फरमाओ,
दाग जो दिल पे लगी है वो दिखायें कैसे!

यादें भी बच्चों की सी होती हैं!

मेरे घर के सफ़ेद से  चादर पर
कुछ गुज़रे हुए से पल
अटके पड़े हैं, सालों से, जैसे
इन्हें किसी से कोई सरोकार नहीं,
हर सुबह  
यादों की सलवट  
मेरे बिस्तर पर
शोर मचाती हैं,
चीखती हैं, चिल्लाती हैं,
थकती है और चुप हो जाती है…..

यादें भी बच्चों की सी होती हैं!

Friday, May 6, 2011

स्पर्श

कोई 16-17 साल की थी मैं, जब तुम्हारा अक्सर आना जाना होता था, छोटे से शहर में, मेरे छोटे से उस घर में! याद है एक बार तुमने यूँही बातों बातों में मुझसे कहा था, के “तुमपे लाल रंग बहुत खिलता है, तुम लाल रंग में मुझे परियों की सी लगती हो”, पूरे एक हफ्ते तक मेरे हर कपड़े का रंग लाल ही होता था! लाल ढीला सलवार और लाल चुस्त कुरता और बालों में लाल परांदा!....मुझे छोटे बाल पसंद थे हमेशा से, पर जाने किसने मुझसे कहा के तुम्हे लड़कियों पे लम्बे बाल पसंद हैं…दिन रात एक कर दी थी मैंने बालों को लम्बा करने  में और जिस दिन ऐसा महसूस किया के अब इतने  लम्बे हो गए हैं के तुम्हे अच्छी लगूंगी,
उस रोज़ मैं खुले बाल लिए तुम्हारे सामने आई इस उम्मीद के साथ के तुम एक बार मेरी ओर देखोगे, और मैं, मैं क्या करुँगी यदि तुमने मुझे देखकर अचानक कुछ कह दिया तो! कहीं  कोई आस पास हुआ, किसी ने कुछ सुना तो!, जब मैं तुम्हारे सामने आई तुम तो मशगूल थे अपने दोस्तों के साथ, तुम्हे तो फुरसत ही नहीं थी  मुझे एक नज़र  देखने की, मैं तो उम्मीदों के आसमान से धीरे धीरे गश्त खाते हुए सच के धरातल पर गिरने ही लगी थी के अचानक........तुमने मेरे बालों को अपनी हाथों में पकड़कर कहा “इन्हें बांध के रखा करो, खुले बालों में तुमको नज़र लग सकती है” तुम्हारा ये कहना था और मैं तो जैसे फिर से आसमान में उड़ने लगी, मुझे तो बस इतना ही याद था के तुमने पहली बार मुझे स्पर्श किया है!
अगले ही दिन तुमने लाल रंग वाली बात कह दी! और तब  से मैंने लाल परांदा बंधना शुरू कर दिया!

मेरे बाल अब तो मेरे घुटनों को छूने लगे हैं, कभी सोचती हूँ इतने सालों बाद मेरे सामने आओगे तो मुझे पहचान भी पाओगे या नहीं! फिर सोचती हूँ के लाल सलवार कमीज़ और लाल परांदे में आउंगी सामने तब तो पहचान
ही जाओगे!


"तेरी ही याद आज भी दिल में बसाये हैं,
हम आज भी उम्मीदों के दिए जलाएं हैं,

एक बार फिर से लौट के जाए तू अगर,
तो पूरा हो मेरे इंतज़ार का सफ़र!"


 

Thursday, May 5, 2011

थोडा सा प्यार

कुछ सांस मुझको उधर दे दो ना,
कुछ खास अब तो मेरे यार दे दो ना,
एक ख्वाब देखा था जो हमने साथ में कभी,
उनका यकीन फिर से एक बार दे दो ना,

मेरे यार मुझको थोडा सा प्यार दे दो ना
फिर लौट आओ तुम मेरे इस जीवन में,
फिर गुनगुनाओ तुम मेरे हर एक पल में
फिर मुझसे मेरी नींदें चुरालो तुम
फिर मुझको एक बार करार दे दो ना,
मेरे यार मुझको थोडा सा प्यार दे दो ना
उम्मीदों की हैं घड़ियाँ अब तो बस थोड़ी सी बची,
मेरी साँसों की लडियां अब तो हैं बस थोड़ी सी बची
वो वादे याद कर लो, तुमको कसम एक बार दे दो ना
मेरे यार मुझको थोडा सा प्यार दे दो ना

बात तो कुछ न थी

बातों बातों में ज़िक्र जब उनका आ गया,
बात तो कुछ न थी पर जाने क्या हो गया,
मेरे दिल में जैसे एक तूफ़ान सा उठा,
और आँखों में तो बस सैलाब आ गया!

हमसे यूँही मिलते रहे

महफ़िल में चंद लोग थे और एक नाम था,
हर एक लब पे जैसे चर्चा ये आम था,
तेरी वफ़ा के किस्से सब यूँ सुना रहे,
के जैसे एक ही धुन सब गुनगुना रहे,
इन महफिलों के दौड़  यूँही चलते रहे,
आप ना हो कर भी हमसे यूँही मिलते रहे,