Friday, September 28, 2012

वो रास्ते अजीब थे जिनकी कोई मंजिल ही न थी!

"मैं और तुम एक दूसरे के लिए नहीं बने.......मुझे अपने ज़हन से निकाल दो चाँद, तुम्हारे ये एहसास तुम्हे तकलीफ के सिवा कुछ भी देंगे,...आखिर क्या मिलेगा तुम्हे मुझे अपने दिल में रखकर, मैंने तुमसे कब कहा कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ?" चाँद ने बस एक बार अपनी नज़रें उठाई और फिर झुका ली.."मुझे बक्श दो...मैं शादीशुदा हूँ.....मेरे दिल में तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं, अब और मुझे आवाज़ देना...मैं लौटकर आऊंगा!"

चाँद निष्प्राण सी वहीँ बैठ गयी...और अपलक आकाश को जाते हुए देखती रही....आकाश चला गया...दूर बहुत दूर...कभी आने के लिए...दूर से नगाड़ों के बजने कि आवाज़ गूँज रही थी...और चाँद बैठी बस सोच रही थी............

"पर उसने ही तो कहा था कि "तुम्हे क्या लगता है मुझे तुमसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता?? मुझे तुम पसंद हो!"

"क्या वो बातें सीर्फ बातें थीं?? वो क्या था जो मैंने उसकी आँखों में देखा था अपने लिए?? वो आँखें जो कभी शांत कभी चंचल थी....जो कभी सब के लिए एक सी पर मेरे लिए कुछ अलग सी थी! वो क्या था जो अकेलेपन में भी अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाता रहा? वो क्या था के जिसका होना मात्र मेरे लिए सबकुछ था..वो जिसको मैंने अपना सबकुछ माना, उसने कैसे कहा ये सब?....

"शादी!...क्या प्रेम से ऊपर है ये बंधन? यदि हाँ तो लोग कृष्ण के साथ राधा का नाम क्यूँ लेते हैं?, क्या जिस रिश्ते का कोई नाम नहीं....वो रिश्ता कुछ भी नहीं??"

Wednesday, September 26, 2012

उसने अपनी उंगली में मेरे साँसों की डोर थम रखी थी....
जब कभी ये सीने से निकलने लगती,
डोर को अपनी ओर खीच थोड़ी और सांसें भर देता...
और मैं फिर से जी उठती!

उसूल

वो अनगिनत उसूल बस टूटते जाते हैं...
हम ज़िन्दगी में जैसे आगे बढ़ते जाते हैं,
सच बोलो, भले रहो, सबको अपना समझो,
माँ बाप की वो सीख भी भली लगती नहीं,
जब अपनों से ही बार बार धोके खाते हैं,
वो अनगिनत उसूल बस टूटते जाते हैं!

Monday, September 24, 2012

हम हमजुबां न सही हमख्याल तो थे, ये भी क्या कम था ज़िन्दगी साथ बसर करने के लिए!


वो

किस तरह बाँध गया तो वो अपनी चंद बातों से
अपनी तीखी नज़रों से,
अपनी उस सादगी से,
अपनी उस खामोशी से,
अपनी भीनी मुस्कान से,
अपने उस इनकार से
जो दर्द कभी और कभी राहत का एहसास थे
जो बेचैन यादें कभी और कभी मुकम्मल खाब थे!

 

Friday, September 21, 2012

नादां दिल

क्या कुसूर उसकी बातों का था, या नादानियां मेरे दिल की,
क्या दर्द उसकी आँखों में था, या बेचैनियाँ मेंरे मन की,
न उसने बाँधा था अपने लफ़्ज़ों से, ना कोई आस ही दी थी,
फिर भी उसके जाने से सब खाली सा क्यूँ हो गया!

मुझको तेरे भी अन्दर वो एहसास चाहिए,
छोटी ही सही एक मुलाक़ात चाहिए,
मुझको मेरी वफाओं का कुछ तो सिला मिले,
मेरी हथेलियों पे तेरा नाम चाहिए!

बदनाम करके भी मुझे मशहूर कर गया
वो शख्स जो कहता था तूने ज़िन्दगी में क्या किया?

हर  एक मुस्कराहट का हिसाब मांगती है ज़िन्दगी,
खुशियाँ किसी की झोली में बस यूँही नहीं बरसती!

कभी दुश्मनों ने तोड़ा, कभी दोस्तों ने लूटा,
के दर्द मुझे मिलता ही रहा किश्तों में!

किश्तों किश्तों में वो मुझे मिलता रहा,
मेरे सब्र की हर मुमकिन इम्तिहाँ लेता रहा!


उसकी खामोशी भी अपनेआप में मुकम्मल है!

चाँद तकता रहा है दूर तलक,
कोई उसको बुझाए तो नींद आए हमें!

वो शाम

इन बारिशों के मौसम में तुम और याद आते हो, तुम्हारे चेहरे की मुस्कान वो रिमझिम फुहारों सी, तुम्हारी पेशानी घनघोर घटाओं सी!

याद है एक बार जब बरसात हुई थी, किस तरह दीवानी सी किसी किशोरी की तरह, झूमती हुई सी मैं चल दी थी बीचो बीच सड़क के और फिर तुमने  मुझे डांटते हुए कहा था "तुम कोई बच्ची नहीं, बड़ी हो चुकी हो! इस तरह सड़क पर अल्लहड़ की तरह चलते हैं क्या?" मैंने जब रूटकर तुमसे मुह फेर लिया था, और आकर बैठ गयी थी तुम्हारे पास में।।।।तुम मेरा हाथ थामकर फिर से ले आये थे उन्ही बादलों के घेरे में, जहां बारिश की बूँदें पड़ती रही थी दोनों पर और तुम मुझे देखते रहे और मुस्कुराते रहे।।।मैं तुम्हारा हाथ थामे जाने किस दुनिया की सैर कर रही थी, भूल गए थे उस शाम हम हर एक रस्म को हर एक बंधन को।।।।

आज फिर बादल है, बारिश की बूँदें हैं और दूर तलक तुम्हारी यादें हैं!


 

हर ज़ख्म तेरी याद मुझे दिलाती रही!

हर सुबह वो सरहदें मुझको रोकती रही,
हर सुबह तेरी आहटें मेरा दामन खीचती रही,
हर सुबह खुद को मैं संभालती रही,
हर सुबह तेरी चौखट से मैं लौटती रही,

हर दिन ये पल मुझपर भारी रहा
हर दिन ये हवाएं मुझसे पूछती रही,
हर दिन मैं राहों में भटकती रही,
हर दिन तेरे ख्वाब मैं सजाती रही,

हर शाम तेरी याद मुझे आती रही,
हर शाम खुद से मैं उलझती रही,
हर शाम तेरे नाम की शमा जलाती रही,
हर शाम पहेलियों में मेरी उलझती रही,

हर रात ये चाँद मुझ चिढ़ाता रहा,
हर रात तन्हाइयों में मेरी कटती रही,
हर रात उम्मीदों के दिए जलाती रही,
हर रात उन्हें खुद ही मैं बुझाती रही,

हर सांस तेरा नाम लिए चलती रही,
हर ज़ख्म तेरी याद मुझे दिलाती रही!

Thursday, September 20, 2012

बस रस्म निभाने के लिए

वो हर बार आया तो बस जाने के लिए,
उसने रिश्तों को बनाया तो बस रस्मों को निभाने के लिए,

उसके दिल में थे जज़्बात,
होठों पर ही मेरा नाम,
जो मेरे साथ भी चला
तो बस रस्म निभाने के लिए
वो जो भी था, तसल्ली थी
के हाथों में है उसका हाथ,
पर उसने हाथ भी छोड़ा
तो बस रस्म निभाने के लिए

के जबतक साथ था मेरे,
मुझे अपना सा लगता था,
कभी तन्हाइयों में भी,
ये दिल पूरा सा लगता था,
पर उसने साथ भी छोड़ा
तो बस रस्म निभाने के लिए

जो जाना था चला जाता,
मेरा दिल तोड़कर जाता,
के वो तस्वीर जो उसने
अपने हाथों से बानाई थी,
के वो शामें जो उसने
अपने हाथों से सजाई थी,
वो शामें और वो तसवीरें,
तो अपने साथ ले जाता,
के जाते वक़्त भी उसने
बस इतनी बात बोली थी ,
के मैं जो तुमसे जुड़ा था वो
बस रस्म निभाने के लिए!

के अब भी आहटें उसकी,
मेरे घर से गुज़रती हैं,
के अब भी याद में उसकी,
मेरी रातें सिमटती हैं,
के अब भी दिल की धड़कन में,
वही तस्वीर बाकी है,
के अब भी ज़िन्दगी मेरी,
उसी के साथ मुमकिन है,
के आये लौटकर फिर से,
भले ही रस्म निभाने के लिए!