Wednesday, October 31, 2012

शोहरत

यूँ तो तुम आते नहीं, कुछ कहते या सुनते भी नहीं, पर जाने क्या सूझी तुम्हे कि मेरी कल्पनाओं की सीमा से निकल, कल रात तुम मेरे खाबों में आए, तुम्हे देखा था गली के उसी मोड़ पर, जहाँ देवी का मंदिर है, हाँ उसी देवी का मंदिर जिसकी चौखट पर मैंने कई साल निकाल दिये तुम्हारा इंतज़ार करते! मैंने तुम्हे आवाज़ लगायी पर तुम तक मेरी आवाज़ न पहुची, वो भीड़ थी लोगों की, वो भीड़ के जिसमें मैं किसी को जानती न थी, देखा तुम बहुत बड़े आदमी हो गए हो, लोग तुम्हारे नाम से तुम्हे पहचानने लगे हैं! याद आया के एक वक़्त था उस छोटे से शहर में जब मैं और तुम मूंगफली खाते घंटों निकाल देते, मैं तुमसे हमदोनो के आनेवाले कल की बातें करती, के किस तरह हम अपनी एक छोटी सी दुनिया बसायेंगे, मैं कहती ‘एक दिन हमारा एक छोटा सा घर होगा’ और तुम कहते ‘छोटा घर क्यूँ? बड़ा सा क्यूँ नहीं? मुझे तो बड़ा घर चाहिए, मुझे बहुत आगे निकलना है चाँद, बस एक मौका मिल जाए, फिर देखना सबको छोड़ कितना आगे निकल जाता हूँ!’ और मैं तुम्हे रोक देती बीच में ही! जाने क्यूँ मुझे ऐसा लगता के हमदोनो के सपने कहीं अलग दिशा पकड़ने लगे हैं! मैं डरती थी उस बड़े घर से, के जिसमें दीवारें तो होती हैं, पर लोग साथ रहकर भी अनजान हो जाते हैं! मुझे मेरी ज़िन्दगी में सिर्फ ‘तुम’ चाहिए थे और तुम्हे ‘सबकुछ’!

वो कहते हैं न उपरवाले से मांगो तो वो सुनता ज़रूर है! मैंने तुम्हारी ख़ुशी मांगी थी! मेरी भी सुन ली उसने, तुम्हे खुशियाँ दी, सबकुछ मिला तुम्हे, तुमने वो सब हासिल किया जो तुम चाहते थे, पर जाने क्यूँ आज तुम्हारे चेहरे पर वो मुस्कान नज़र न आई, जो मुझे अक्सर दिखा करती थी! तुम खुश तो हो न??????

Monday, October 29, 2012

याद

अब भी याद है किस तरह हम घरवालों से नज़रें बचा एक दूसरे से इशारों में बातें करते थे, कभी बात बात में तुम कुछ ऐसी बात कह जाते जिसे सुन मेरे चेहरे पर अनायास ही मुस्कान बिखर जाती, नज़रें झुक जाती, कभी यूँ भी हुआ के किस्मत से कुछ लम्हे मिले जब हम तुम और कोई नहीं.... मैंने दो प्याली चाय बनायी, और गर्म चाय ठन्डे हो गए, दोनों को होश ही न था, तुम तुम्हारी नज्में सुनाते और मैं अपलक तुम्हे निहारती रहती, जितनी सुन्दर आँखें, उतनी सुन्दर सोच, तुम्हे सुनना पसंद था मुझे, आज भी है...

वक़्त और किस्मत ने दोनों को एक ही छत के नीचे रख छोड़ा, और अब कोई नहीं होता....पर तुम भी नहीं होते!

एक अधूरी कहानी!

आरती एक आम लड़की थी, बस एक सीधी साधी सी लड़की, दिन रात अपने काम में व्यस्त रहनेवाली, एक ऐसी लड़की जिसने ज़िन्दगी को जितना सहज बनाने की कोशिश की, जटिलता बढ़ती गयी, वक़्त ने सर से पिता का साया छीन लिया, जिस से बेपनाह मुहब्बत की वो बीच रस्ते में छूट गया, घरवालों ने शादी करवाई, वो भी नाकाम रही....और ज़िन्दगी के पूरे दस बरस उसने तनहा ही काट दिये, दिन रात खुद को व्यस्त रखना ही एक उपाय समझ में आया था, सो किया, गुज़रे सालों में अनगिनत लोग मिले, लेकिन आरती खुद भी समझ न पाती कि वो हर किसी में किसे तलाशती है, मुहब्बत इंसान को कहीं का नहीं छोड़ता, हर चेहरे में एक ही चेहरा तलाशने की आदत सी पड़ जाती है, और जब थोडा नज़दीक से देखो तो वो चेहरा बिल्कुल ही अलग होता है, वो फिर दूर चली जाती और खुद को और भी ज्यादा दुनिया से काट लेती..........वक़्त तो बदला पर आरती नहीं, आरती की अब ये आदत सी हो गयी थी, जब ज्यादा मुस्कुरा लेती तो खुद को सवालों के कटघरे में खड़ा कर पूछती कि क्यूँ हंस रही है? हंसने की ऐसी कौन सी वजह मिल गयी तुझे? तू तन्हाँ है, ये लोग जो मिलते हैं वो बस यूँही मिलते हैं..इनमें से कोई तेरा अपना नहीं, हाँ अपना था वो एक शख्स जो छोड़ गया तुझे बीच मझधार में! कुछ ऐसी ही सोच आरती को फिर से उसी तन्हाई में ला पटकती जहाँ से वो दिन रात भागती फिरती, तन्हाई की शिकार आरती उस शख्स को पसंद करने लगी थी, जिसे वो जानती भी न थी! वो एक लेखक था, अपने एहसासों को शब्दों में पिरो परोसना उसका पेशा था, वो अपनी खामोशी को भी आवाज़ देने का सलीका जनता था, ये हुनर उसे विरासत में मिला था! पर आरती सच से कोसों दूर थी, आरती दिन रात उसकी किताबें पढ़ती, और हर किताब की पात्रा में वो अपनी छवि तलाशती, वो दिशाविहीन मोड़ पर खड़ी थी, उसे खुद भी मालूम न था कि वो खुद के साथ क्या कर रही है! अक्सर उसके हाथ में बस एक किताब होती...वो अपने शब्दों के जाल फेंकता जाता और आरती उस जाल को एक सुनहरा रेशमी दुपट्टा समझ उलझी रहती.....  

Saturday, October 27, 2012

बस यूँ ही...

कल्पना या सत्य? बूझ या अबुझ? अनजान या पहचान? कौन हो तुम? तुम शोर हो या खामोशी, तुम होश हो या बेहोशी, कोई खता हो तुम या नादानी? कौन हो तुम?........

 
“तुम मुझे और अपनी मुस्कान से ठग नहीं सकते,
कि मैं जान गयी हूँ इस मुस्कान के पीछे छिपे षड़यंत्र को,
हाँ वो जो तुमने भेस बना रखा है साधुओं सा,
वो सच नहीं, सिर्फ एक भ्रम है जो तुम लोगों के आँखों में भरते हो,
हाँ मैं जान गयी हूँ के तुम वो नहीं जो प्रत्यक्ष नज़र आते हो,
तुमसे ठगी गयी  हूँ मैं या के अपने भाग्य के हाथों,
नहीं जानती, पर मैं ये जान गयी हूँ के इस मुस्कान के पीछे एक षड़यंत्र है!”

मैंने अक्सर गौर किया है,
कि तुम जब नहीं दीखते
तो मेरे मन के सुर ताल नियंत्रण में रहते हैं,
मेरी आँखें टिकी रहती हैं एक ही दिशा में,
तुमपर एक नज़र पड़ते ही, कुछ हलचल सी मच जाती है,
और मैं सारी दुनिया से बेखबर चल देती हूँ
तुम्हारे पीछे पीछे, एक अज्ञात रास्ते पर
कि जिसपर न मंजिल का पता न सफ़र का,
जानती हूँ तो सिर्फ इतना के तुम हो, मुझसे आगे... रास्ता दिखाते हुए,
जबकि तुम पलटकर एक बार नहीं देखते,
न थामते हो हाथ ही मेरा,
न कहते हो, ‘मुझे तुम्हारी परवाह है’,
न सुनते हो मेरी अनकही बातों को,
न परख पाते हो उन खुशबुओं को जो मुझमें जन्मी थी उस वक़्त कि जब मैंने तुम्हे याद किया था,
कहते हैं एकतरफा प्यार कभी ख़त्म नहीं होता.....
पर किसी ने ये क्यूँ न कहा कि एकतरफा प्यार कभी पूरा नहीं होता!

Friday, October 26, 2012

तन्हाई

अब तो एक अरसा हुआ कि मन को कहीं चैन नहीं, सबसे बातें करना भी एक मजबूरी सा महसूस होता है, कई सारे रिश्तों के बीच भी जैसे अकेलापन है, मन के अन्दर जैसे जाने कितनी बातें चल रही हैं जाने कितने सवाल जिनका जवाब उसे मालूम नहीं!

सुबह से कई बार मोबाईल फोन को देख, सोचती है कि किसी से बात करूँ! माँ से बात करती हूँ, नहीं वो मेरी आवाज़ सुनते ही सवाल करने लगेंगी, कुछ खाया कि नहीं? क्या हुआ आवाज़ उदास क्यूँ है बोल? सवालों से बचने की आदत है उसकी, फिर सोचती है किसी दोस्त से बात कर लूँ! चंद नाम मोबाईल में दीखते हैं, पर किसे दोस्त कहें और किसी सिर्फ पहचान, कुछ तय नहीं कर पाती, कोई ऐसा नहीं जिसे मेरा इंतज़ार हो, ये सोच, मोबाईल फिर से टेबल पर रख देती है.....सोच से बाहर  निकलने की कई तरकीबें सोची, पर सब ने पीछा छुड़ा लिया, दूर दूर तक कोई नहीं, साथ है तो बस तन्हाई, आईने के सामने जाती है और अपने होंठों को जबरन फैलाकर हंसने की कोशिश करती है, देखना चाहती है कि मुस्कुराता चेहरा कैसा दीखता है...एक बार फिर अपने ही फैले होंठ और हँसते हुए आँखों को देखना चाहती है, होंठ मुस्कुराने से इनकार कर देते हैं, आँखों में कोई भाव नहीं, आँखें तो पत्थर सी हो चुकी हैं.....एक गहरी सांस लेती है और अपने बालों का जुड़ा बना रसोईघर में चली जाती है, हाँ अक्सर यही सोचती है के काम में जुट जाऊं तो शायद तन्हाई का एहसास कुछ कम हो जाए, पर ऐसा होता है क्या? उदासी कुछ पल का सफ़र नहीं....बहुत गहरा, बहुत लंबा सफ़र है.....शायद कुछ ऐसा जो कभी ख़त्म नहीं होता!

 

Thursday, October 25, 2012

बस यूँ ही...

"सब तो आते हैं बस तुम ही नहीं आते,
कि जबकि तुम वाकिफ हो इस बात से कि मैं आती हूँ, सीर्फ तुम्हारे लिए,
कि मेरा हर पहर गुजरता है सिर्फ तुम्हारे ही इंतज़ार में,
कि मेरी नज़रें टिकी रहती हैं सिर्फ तुम्हारे एक आहट के लिए,
सब तो आते हैं बस तुम ही नहीं आते,
कि जबकि तुम वाकिफ हो इस बात से कि मैं आती हूँ सीर्फ तुम्हारे लिए,
कि मेरा मन सिर्फ तुमको याद करता है,
कि मेरी धड़कने सिर्फ तुम्हारे लिए मचलती हैं,
कि कोई आए तो लगता है एक बार पूछ लूं तुम्हारा भी हाल,
जान लूं कुछ ऐसी बातें जो तुमने मुझसे न कही,
पर शायद दबी हैं तुम्हारे होंठों में कहीं,
वरना सोचो तो, जो तुम्हारे मन में मेरे लिए प्रेम न होता,
तो क्या मेरा दिल तुम्हारे लिए यों धड़कता?
क्या मेरी नज़रें सिर्फ तुम्हे तलाशती?
सब तो आते हैं बस तुम ही नहीं आते,
कि जबकि तुम वाकिफ हो इस बात से कि मैं आती हूँ, सीर्फ तुम्हारे लिए”

“बस.....और चंद रोज़ देख लो मुझे,
जल्द ही चली जाउंगी यहाँ से,
न ये रास्ते मेरे हैं, न गलियाँ ही,
तुम्हारी गंध थी के खिची चली आई थी,
लेकिन उसपर मेरा हक नहीं, जरा देर से समझी..
मैं जानती हूँ, के मुझे भुलाना तुम्हारे लियी भी आसां न होगा,
इसीलिए कह रही हूँ, और चंद रोज़ देख लो मुझे!
जो इस बार गयी तो लौटना मेरे बस में न होगा!”


हर बार समेटती हूँ अपने वजूद को,
मुझे मुझसे वो दूर करता जा रहा है!”

बस यूँ ही.............

"जानते हो तुम्हारे उस एक ख़त को मैंने कई दफ़े पढ़ा
ये सोचकर के शायद मेरे दिल को जो तुमने चोट पहुचाई है
उसकी ‘आह’ यादों को लग जाए और ये मुझे बक्श दें,
कि शायद वो दर्द मुझमें तुम्हारे लिए कभी न ख़त्म होनेवाली नाराज़गी भर दे,
जिसके सहारे तुम्हे भुलाने की नाकाम कोशिश मेरी कामयाब हो,
ये दिल तो बदनाम था ही कमबख्त यादें भी बेईमान हैं,
देखो न यादों को मेरे दर्द से कोई फर्क नहीं पड़ता,
ऐसा लगता है तुमने अपना हाथ छुड़ा इनके हाथों में मेरी डोर धर दी है
और ये बेशर्म मुझे छोड़ती ही नहीं!"

"वो कहता है,
‘यूँ भी कोई जाता हैं क्या, बगैर इक्तला दिये?
मुझे यकीन है, ये, वही है.........’
वो अब भी उसकी वही पुरानी सी तस्वीर लिए फिरता है,
मैंने कई बार समझाया उसे
कि इस तस्वीर से वो लड़की बिल्कुल मेल नहीं खाती!
वक़्त के थपेड़ों ने उसे बदल दिया,
वो अब हंसती नहीं इस तरह, कि लगे फूल खिलें हो,
उसने खुद को व्यस्त कर लिया है  रोज़ मर्रा के कामों में
न पलकों में अब सपने हैं, न आँखों में मुस्कान ही,
तुम्हारी कल्पना का चाँद अब मुरझा गया हैं,
जाओ कुछ और यादें बनाओ, किसी और को आज़माओ,
उसकी पथराई आँखों में अब कोई चाह नहीं,
कि इस तस्वीर से वो लड़की बिल्कुल मेल नहीं खाती!"

"सुनो, तुम जो जाते हो, तो कह कर जाया करो,
यूँ मुझसे इंतज़ार क्यूँ करवाते हो?
मेरी ख़ामोशी को समझने की कोशिश तो करो,
यूँ शब्दों के जाल फेंकना अच्छा नहीं लगता,
लोगों को कब पता है मेरे दर्द-ए-दिल का सबब,
तुम जानते हो, मुझे दोहराना अच्छा नहीं लगता!"

"मुझसे ख्यालों की महफ़िलें अब और सजतीं नहीं,
तुम्हारा जाना, मेरी हस्ती को वीरां कर गया है!"

Tuesday, October 23, 2012

कहो क्या बेहतर है, मेरी सूरत या मेरी सीरत?

कहो क्या बेहतर है,
मेरी सूरत या मेरी सीरत?
वो सूरत जिसपे तुमने पहली ही बार में अपना हक़ समझ लिया था,
वो सूरत जिसे देख तुम हर रिश्ते नाते भूल बैठे थे,
वो सूरत जो वक़्त के साथ धुंधला गया है,
वो सूरत जिसे तुम आज भी देखकर कहते हो,
के “मुझे तो फर्क नज़र नहीं आता”,
वो सूरत जिसे तुम्हारे ही अपनों ने तुम्हारे ही सामने रुसवा किया
वो सूरत जो सीर्फ तुम्हारे लिए बनी थी पर किसी और ने उसे अपना लिया!
कहो क्या बेहतर है,
मेरी सूरत या मेरी सीरत?
वो सीरत, जिसने तुम्हे मुझसे दूर जाने न दिया,
वो सीरत, के जिसको वक़्त के साथ तुमने पहचाना, माना,
वो सीरत, के जिसको देख तुम्हे ये सूरत और भी प्यारी लगी,
वो सीरत, के जिसके आगे तुम्हे कोई मुझ सा नहीं लगता,
वो सीरत के जिसकी परवरिश में मैंने अनगिनत साल खर्चें हैं,
वो सीरत, के जिसमें बस प्रेम बसा है, तुम्हारे लिए,
और तुमसे जुड़े हर किसी के लिए, 
कहो क्या बेहतर है,
मेरी सूरत या मेरी सीरत?

Monday, October 22, 2012

बस ऐसी ही रहना

ज़िन्दगी के कड़वे तजुर्बों ने,
लोगों से मिली हिकारतों ने,
वक़्त के सितम ने,
तुमसे बिछड़ने के ग़म ने,
हर बार हमको दर्द दिया,
हर बार रोने पर मजबूर किया,
और जब जब हमने ये फैसला लिया,
कि बस अब और नहीं,
अब हम भी थोड़े बेईमान हो जाएं,
लोगों से मिले दर्द उनको लौटाएं..
कि फिर किसी ने एक बार कह दिया,
तुम बहुत अच्छी हो, बस ऐसी ही रहना!

उदासी की औकात

हाँ, जानती हूँ खुश होने की कोई वजह नहीं, तुम भी आसपास नहीं, तुम्हे मालूम नहीं, तुमसे छिपा के मैंने चंद लम्हें चुन लिए थे उस वक़्त जब तुम पलकें मूंदें किसी और ही धुन में, कहीं और ही विचर रहे थे, ठीक उसी वक़्त मैं तुम्हारे सिरहाने बैठे तुम्हारे चेहरे को अपलक देख रही थी, तुम्हारे चेहरे के बदलते भाव से मुझे आनंद की अनुभूति हो रही थी, उन्हें मैंने सहेज रखा है अपने पास, के जब भी उदासी अपनी हदें पार करने लगती हैं, मैं उनको उनकी औकात याद दिलाती हूँ, तुम्हारे उन लम्हों को एक बार फिर से अपने आँचल से खोल, उनमें खो जाती हूँ!

Friday, October 19, 2012

सांसें अपने बस में कहाँ होती है!

हाँ, मैं यहीं हूँ...
बस तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी,
तुम आ गये,
मेरा इंतज़ार पूरा हुआ,
अब चलती हूँ,
के ये मेरा इंतज़ार कोई रस्म नहीं,
न कोई रिवाज़ है, बस एक एहसास है,
एक एहसास जो तुम्हारे लिए, हाँ सीर्फ तुम्हारे लिए है..
आज से नहीं ..हमेशा से,
वो एक एहसास के जिसके सहारे मैंने उम्र गुज़ार दी,
वो एक एहसास के जिसके आगे मैंने कुछ भी न देखा,
तुम्हारी हर बात मैंने धर्म की तरह निभाई है,
तुम्हारे इस रिश्ते को मैंने एक पौधे की तरह पाला है,
जिसका बीज तुमने कभी मेरे मन में डाला था,
कुछ अनकही बातें, कुछ अनसुलझे से पल,
कुछ बेरहम फैसले, जिनमें गुज़रा अपना कल,
हाँ वो बस एहसास थे
जिसका होना अब तुम्हारे लिए मायने नहीं रखना,
सो अब चलती हूँ!
के एक और बार तुम जाओगे,
और मैं अपलक तुम्हारा इंतज़ार करुँगी,
ये मुमकिन नहीं.....
सांसें अपने बस में कहाँ होती है!

Thursday, October 18, 2012

तुम्हारी ख़ामोशी.........

हाँ ऐसी बहुत सी कविताएँ अधूरी छोड़ रखी हैं मैंने,
कि जिनके पूरे होने कि कोई गुंजाइश नहीं,
वो कहते हैं न बातें अधूरी हो, तो कहानी पूरी कैसे हो,
मैंने तुमसे कहा, हाँ कई बार कहा, पर
तुम चुप थे, सुनते रहे,
और आखिर अपनी बेड़ियों को तोड़ पाना तुम्हे नामुमकिन लगा,
हाँ एक बार नज़रें उठाई थी तुमने, कुछ इस तरह,
कि बहुत कुछ है जो तुम कहना चाहते हो,
जैसे एक पूरी ज़िन्दगी पड़ी है, जो जीना चाहते हो,
जैसे किसी पहाड़ के सबसे उपरी सतह पर जाकर मेरा नाम पुकारना चाहते हो,
जैसे इन नियमों, कानूनों से दूर, मेरा हाथ पकड़ मुझे ले जाना चाहते हो,
जैसे एक और बार मेरी आखों में अपने सपने सजाना चाहते हो,
पर तुम खामोश रहे,
चलते वक़्त पलटकर भी न देखा,
याद है एक बार तुमने
तुम्हारी वो तस्वीर लगायी थी,
और लगाते वक़्त कहा था, “देखो, इसे यहाँ से कभी हटाना नहीं,
तुम्हे मुझे तलाशने की कभी ज़रुरत न पड़ेगी,
मैं यहीं हूँ, यहीं रहूँगा....तुम्हारी नज़रों के सामने....
तुम्हारी तस्वीर थोड़ी तिरछी हो गयी है,
एक बार आ जाओ इसे ठीक कर चले जाना!”

इश्वर है....यहीं, इसी दुनियां में!

हर बार जब परेशानी आती है तो हम उपरवाले को सवालों के कटघरे में खड़ा कर उस से अपने हालात की वजह पूछते हैं, शिकायत करते हैं और कहते हैं के तू नहीं है इस दुनियाँ में, यदि है तो नज़र क्यूँ नहीं आता, जब सवाल कर रहे होते हैं तो वो करने की आज़ादी हमें सीर्फ इसलिए होती है के वो कोई जवाब नहीं देता! हमारी तरह शब्दों से खेलना उसे नहीं आता, वो सुनता है और मुस्कुराता रहता है, शायद ये सोचकर के जो सामने खड़ा मुझसे सवाल कर रहा है वो कितना मुर्ख है! सच है कोई भी परिस्थिति सदा के लिए नहीं होती, हम नाहक ही घबराते हैं, परिस्थिति का सामना करने और उससे उबरने के बाद भी हमारी सोच हमें यही कहती है के “वो” कहीं नहीं, ये जो कुछ किया ये हमने खुद किया “वो” कहीं मजूद नहीं, पर क्या ये सच है? क्या वो कहीं नहीं? यदि वो न होता तो क्या इन साँसों का आवागमन यूँही चलता रहता?  

“नहीं” ये हमारी कमी है कि हम उसे पहचान नहीं पाते, क्यूंकि वो आभूषण, राजसी वस्त्र, त्रिशूल या गदा के साथ सामने नहीं आता, वो यहीं इसी दुनियाँ में रहता है, किसी साधारण से दिखने वाले इंसान के  अन्दर, हाँ वो इंसान जो हर परिस्थिति में हमारे साथ होता है, वो इंसान जो हमें हमारी परिस्थिति से जूझने में सहायता करता है, जो हमारा आत्मबल बढ़ाता है, वो हर पल साथ न होकर भी साथ होता है,   वो हमारा बांह थामे हमें उस परिस्थिति से बहार निकाल लाता है, वो हमारे आसपास होता है पर नज़रें उसे पहचान नहीं पाती वजह सीर्फ इतनी है के हमें शिकायत करने की आदत है जो नहीं मिला उसके लिए रोने के क्रम में उन तमान खुशियों को नज़र अंदाज़ कर देते हैं!

Wednesday, October 17, 2012

वो कैसा दोष था मेरा जो तुमने दिल मेरा तोड़ा!

के अब मुश्किल होगा तुम्हारे लिए मुझको ढूंढ पाना,
छोड़े जा रही हूँ इस दुनियाँ को तुम्हारी,
वो दुनियां के जिसकी रस्मों के लिए तुमने मुझको छोड़ा था,
उसी दुनियां में तनहा फिरोगे तुम मेरे बगैर,
मुझको याद है तुमने कहा था, मैं रह सकता हूँ यूँ अकेला भी,
पर तुम्हारा साथ होता तो ज़िन्दगी कुछ अलग सी होती,
के तुमबिन यूँ तो जीता आया था मैं कई बरसों से,
मगर अब न मिलोगी तो ज़िन्दगी कुछ खाली सी होगी,
और उसके बाद ही वो एक संदेसा
हाँ वही संदेसा, के जिसको पढ़के तुमने मुझे छोड़ने का निर्णय लिया,
मेरा तुम्हारी ज़िन्दगी में आना भी तुम्हारा निर्णय था,
और तुम्हारा मुझे छोड़ के जाना भी तुम्हारा निर्णय था,
मैं स्तब्ध थी अबतक, हाँ तभी तो उस एक पल में साँसे अटका रखी थी,
पर अब आज़ाद हूँ....
मैं आज़ाद हूँ के आज तुमने ही मुझे मेरा रस्ता दिखाया है,
वही बाहें के जिनको थाम के इस सफ़र को तय करना चाहते थे तुम,
आज उन्ही बाहों को बेआसरा छोड़ तुमने नयी दुनियाँ बसा ली है..
हाँ जानती हूँ तुमने समझौता करना सीखा लिया है,
पर मैंने नहीं,
आजतक न सीख पायी इस छोटे सबक को,
के तुम्हारे बिन भी तुम्हारे साथ होती हूँ,
तुम्हारी याद में हर पल हर दिन मैं रोती हूँ,
न तुम आये न कोई संदेसा ही तुम्हारे नाम का,
के आखिर हार कर मैं खुद तुम्हारे पास आई थी,
और तलाशने की एक नाकाम कोशिश भी की
कि तुम सबकुछ छोड़ कर एक बार फिर वापस तो आओगे,
उन्ही कसमों उन्ही वादों का कुछ तो रस्म निभाओगे,
मगर यहाँ तो ये आलम देखा के आँखें चौंधिया गईं
न तुम आये मुझतक ना तुम्हारी कोई परछाई..
हाँ वो आई थी के जिसको उम्रभर नफरत किया मैंने,
उसी के साथ गुजरी शाम हर आहट पे चौंकती के अब तुम आओगे,
के आखिर जाने के लिए जब मेरे कदम उट्ठे,
वहीँ परदे के पीछे एक साया सा दिखा मुझको,
वो तुम थे....
वो तुम थे हाँ तुम्ही थे तुमको पहचान लिया मैंने,
तुम्हारी एक खुशबु सौंधी सी थी..जान लिया मैंने,
तुम्हे भी इल्म था के ये न जाएगी यहाँ से गर,
न तोडा दिल जो इसका रुसवाई हो जाएगी फिर इधर,
और इसपर सामने पर्दा हटा के वो तेरा आना,
और आके मुझसे ये कहना के जाओ तुम फिर न आना,
तेरे वो लफ्ज़ कानों में मेरे अब भी आवेज़ा है,
मेरी रुखसत का अब है वक़्त, जो मुमकिन हो तो तुम आना,
के बस एक सवाल ही तुमसे हाँ मुझको आज करना है,
वो कैसा दोष था मेरा जो तुमने दिल मेरा तोड़ा!

Tuesday, October 16, 2012

क्या वो फैसला सही था?

हाँ वो अब भी वहीँ रहता है, कुछ अरसे पहले उसकी नौकरी छूट गयी, दूसरी मिली नहीं....या शायद उसने तलाशने की कोशिश नहीं की, उसने शेव भी करना बंद कर दिया है, उसके दोस्त कहते हैं के वो बिल्कुल मजनू सा बन बैठा है! जाने कौन सी लड़की होगी जिसने उसकी ये दशा कर दी, मैंने तो यहाँ तक सुना है कि उसकी पत्नी भी उसे चैन से जीने नहीं देती थी, और आखिर छोड़ के चली गयी उसे! ....बेचारा!....खैर, मैं चलती हूँ मुझे भैया ने कहा था जल्दी वापस आने, अपना ख्याल रखना आस्था, बाय!

निशा अपनी बात पूरी कर वहां से चली गयी, और आस्था आती जाती लहरों पे नज़र गाड़े माज़ी में डूब गयी...........

वो एक नीम का पेड़, जहाँ दोनों घंटों बातें किया करते थे, उस से थोड़ी ही दूर एक चाय की दूकान, हाँ वही चाय वाला....जिसे वो दो प्याली चाय देने कहता और जब चायवाला चाय ले के आता और आस्था को देने लगता तो चंदर चायवाला के हाथ से दोनों प्याले चाय के ले लेता फिर एक प्याली आस्था को देता...कई बार ऐसा होने के बाद एक दिन आस्था ने पूछ ही लिया, “वो देता है तो तुम उसे देने क्यूँ नहीं देते?” चंदर ने मुस्कुराते हुए कहा “मैं नहीं चाहता कि चाय कि प्याली पकड़ाते हुए वो तुम्हारी उंगली छूए” चंदर की बात पर आस्था बस हंसती रही, उसे ये सुध न रहा के वो कहाँ खड़ी है! उसकी हंसी की वजह ये भी थी कि वो खुश थी, ये सोचकर कि चंदर उस से कितना प्यार करता है! अचानक ही वो बोल पड़ी, “यदि मैं तुम्हे छोड़कर चली गयी तो...रह लोगे?” चंदर चुप रहा! कुछ बातें ऐसी होती हैं हमारी ज़िन्दगी में जिनका ज़िक्र मात्र भी सदमें से कम नहीं होता! दोनों...हाथों में हाथ डाले सड़क के किनारे चल रहे थे, और चंदर बोल पड़ा “आस्था, तुम्हारे बिना बस रात गुज़रती है, कमबख्त नींद नहीं आती बस रातभर घड़ी कि सुनियों को तकता रहता हूँ के कब सुबह हो और तुम्हारा चेहरा देखूं...जानती हो, उस रोज़, हाँ ‘उस रोज़’ ही कहूँगा, क्यूंकि ये तीन साल कैसे गुज़र गए मालूम ही नहीं चला, हाँ तो मैं क्या कह रहा था?

“तुम कह रहे थे, उस रोज़......”

“हाँ उस रोज़, जब पहली बार तुम्हे देखा था, तो देखते ही सोचा था के कोई इतना भी खूबसूरत हो सकता है क्या? और अगला ख्याल यही आया था के क्या तुम मेरी हो सकती हो? आई मीन....तुम जैसी खूबसूरत, चंचल और जैसा पहली बार देख के लगा था..खुले विचारों कि लड़की, को मुझ जैसा सिम्पल लड़का, जो न किसी से ज़्यादा बातचीत करता है, इन्फेक्ट मुझे तो लड़कियों से बात भी करने की हिम्मत नहीं होती..यदि कोई लड़की आ के मुझसे कुछ पूछे तो बस उसके सवाल का जवाब दे के वहां से चला जाता था, और ऐसा जवाब देता था के दोबारा बात करने न आये...न मेरे अन्दर कोई आदत ही थी, जैसे सिगरेट वगैरह पीने कि, हाँ दोस्त कहते थे के सिगरेट पीने से भी लड़कियों पर अच्छा इम्प्रेसन पड़ता है, पर मैंने पढ़ाई को छोड़ कभी किसी ओर ध्यान नहीं दिया! पापा ने दिल्ली आते वक़्त ही कहा था के ‘तुझे इतनी दूर पढ़ने भेज रहा हूँ, दोस्तों के साथ मस्ती करने नहीं, इस बात का ख्याल रहे, तू अकेला लड़का है मेरा... और तेरी बहनों कि ज़िम्मेदारी भी तुझपर है, मुझे कभी शर्मिंदा न होना पड़े!’ पापा कि वो बातें हमेशा याद रही, और बस कभी किसी ओर ध्यान नहीं दिया, फिर कई सालों बाद तुम्हारा.....चाची जी के घर आना, हाँ आस्था ऐसा नहीं के पहली बार तुम्हे देखा था, लेकिन शायद जिस शख्स को आप बचपन से देखते आये हो, और कुछ सालों तक न मिलो फिर अचानक ही सामने आये, तो...ऐसा सब के साथ होता हो ये ज़रूरी नहीं, पर मेरे साथ हुआ, तुम्हे पहली  ही बार जब देखा तो ऐसा लगा, जैसे इसे ही लव एट फस्ट साईट कहते हैं, हाँ तरीके से उस दिन पहली ही बार तो देखा था.. तुम्हे देखने के बाद बस एक ही सोच आई...काश तुम मेरी होती! जानती हो, वो जो उनदिनों मैं अक्सर शाम को तुम्हे दिखा करता था, तुम्हारे घर के सामने से गुजरता हुआ, वो इक्त्फाकन नहीं होता था..मैं अपने छत से देखता रहता था, और जब तुम बालकनी में आके खड़ी होती, तभी जल्दी जल्दी शर्ट और जींस पहन घर से निकल पड़ता, कि एक बार तुम्हे सामने से देख लूं....सच आस्था आज भी दीवाना हूँ मैं तुम्हारे लिए...चलो शादी कर लेते हैं!

आस्था..चंदर की बात सुनती रही, हाँ थोड़ी संजीदा हो गयी थी, वजह...शायद ये थी के आस्था ‘सच’ जानती थी, वो जानती थी कि ये शादी नहीं हो सकती....के दोनों का साथ अब बस कुछ ही दिन का और है...

अक्सर होली में चंदर अपने घर जाया करता था, इस बार भी जा रहा था, “तुम खुद कब सीखोगे अपने सारे सामान ठीक से रखना चंदर?” आस्था बोलते हुए चंदर के सामान पैक कर रही थी, “सुनो अभी ठण्ड पूरी तरह से गयी नहीं...ध्यान रखना ज़्यादा भीगना नहीं...और हाँ भाभी लोगों के साथ होली खेलने कि कोई ज़रुरत नहीं!”

“क्यूँ? जलन होती है?” चंदर बोल पड़ा..

“न, मुझे जलन क्यूँ होने लगी! पर हाँ, कोई तुम्हारी ऊँगली भी छूए, ये मुझे गंवारा नहीं!” आस्था ने हँसते हुए कहा और फिर दोनों हंसने लगे, कुछ देर बाद चंदर चला गया! और आस्था वही खड़े चंदर को जाते हुए देख रही थी, जाने क्यूँ ऐसा लग रहा था जैसे इस बार ये सब अंतिम बार हो रहा है, चंदर के जाने के बाद हर दिन आस्था के लिए एक बोझ सा बन गया,

“आस्था, देख कितने अच्छे अच्छे रिश्ते आ रहे हैं, अब हाँ कह दे बेटी, देख ये लड़का...कितना अच्छा है...सुन्दर भी है, डाक्टर है ये, और सर पर कोई ज़िम्मेदारी भी नहीं, बहुत खुश रखेगा तुझे”!

“मुझे नहीं देखना कोई लड़का, मुझे कहीं नहीं जाना, मुझे तुम्हारे साथ ही रहना है माँ”

“समझती हूँ, पर कबतक? माँ बाप हमेशा तो साथ नहीं रह सकते? ठीक है, तुझे दिवाली तक वक़्त देती हूँ, यदि कोई तेरी नज़र में है तो बता दे, वरना इस लड़के के लिए हम हाँ कह देंगे,

होली गुज़रे दस दिन हो गए, पर चंदर न आया! आस्था अपने घर के बालकनी में दिन भर में अनगिनत बार जाती, और हर बार नाउम्मीद लौटती, चंदर के दरवाज़े पर अब भी ताला लटक रहा था...उसके मन में एक अनजाना डर घर कर गया था! “वो आएगा या नहीं?” चंदर न आया पर उसका एक ख़त आया!

“आस्था, यहाँ मेरे लिए ये लोग लड़की देख रहे हैं, जाने नहीं दे रहे, ऐसा लगता है तुमने मुझे इस बार आने ही क्यूँ दिया? रोक लेना चाहिए था तुम्हे, मेरा दम घुटता है यहाँ, तुम्हे देखे जैसे एक अरसा हो गया, मैं तुम्हारे सिवा किसी और से शादी नहीं कर सकता, मैं शादी नहीं करूँगा कभी भी, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता, और पापा को तकलीफ भी नहीं दे सकता, वो कहते हैं यदि मैंने तुमसे शादी की, तो वो आत्महत्या कर लेंगे, क्या करूँ आस्था बोलो, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा! ऐसा लगता है जैसे मैं फंस सा गया हूँ...तुम्हारे बिन जीना, मतलब खुद को जीते जी मर देना.. मेरी हर ख़ुशी सीर्फ तुमसे है...पर मैं.........कुछ समझ नहीं पा रहा...प्लीज़ बताओ आस्था क्या करूँ?”

इस ख़त को आस्था ने कई बार पढ़ा, फिर देर रात उसने चाँद शब्द कागज़ पर उतारे....लिखते वक़्त उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वो खुद को छलनी अपने ही हाथों कर रही है!.........”तुम शादी कर लो” इन शब्दों को कागज़ पर उतारने के बाद, आस्था ने एक गहरी सांस ली...... फिर खुद को समेट... आगे लिखना शुरू किया... “पापा जहाँ कहते हैं वहीँ, उसी लड़की से, अपनी जिम्मेदारियां निभाओ, और कोशिश करना खुश रहने की...हाँ जानती हूँ खुश रहना आसान नहीं, पर मुस्कुराते रहोगे तो ख़ुशी भी आ जाएगी....मेरी चिंता न करना चंदर... मेरे पास बहुत कुछ है...हमदोनो ने मिलकर इतनी यादें बनायी हैं, जिसको याद करते ज़िन्दगी गुज़र जाएगी, और हाँ सुनो...तुम्हे मेरी आँखों में आंसूं कभी नज़र न आयेंगे, मेरे पास मुस्कुराने की तमान वजहें हैं! जो तुमसे मिली हैं...चंदर तुम्हारे एक रिश्ते में मैंने हर रिश्ते को जिया है...कभी महसूस ही नहीं हुआ के तुम मेरे मात्र प्रेमी हो! हाँ तुमने जो रिश्ता बुना वो रिश्ता “परवाह” का रिश्ता था, तुमने मुझे पूरी तरह बदल दिया, और इस बदलाव से मुझे कोई शिकायत नहीं...हर बार तुमने मुझे रास्ता दिखाया, जब जब ज़िन्दगी ने मेरा इम्तिहान लिया, तुमने हाथ पकड़कर मुझे आगे बढ़ना सिखाया, तो क्या हुआ के हम ज़िन्दगी भर साथ नहीं रह सकते? जो यादें हमारी हैं वो तो हमसे कोई नहीं छीन सकता ना? तुम शादी कर लो....जहाँ पापा कहते हैं, वहां! हमारा रिश्ता है और हमेशा रहेगा! क्यूंकि हम दिल से जुड़े...और दिल का जुड़ाव कभी ख़त्म नहीं होता! अपना ख्याल रखना.........सीर्फ तुम्हारी आस्था!  

चंदर का फिर कोई जवाब न आया, आस्था ने बस इतना ही सोचा के वो खुश होगा! अबतक तो उसके बच्चे भी हो गए होंगे, और फिर इतने साल तक कहाँ कोई किसी को याद रखता है!....यही सोचती रही के उस एक फैसले ने चंदर की ज़िन्दगी खुशहाल बना दी होगी! पर आज निशा की बातों ने उसका सारा सुकूं छीन लिया..और वो एक सवाल उसे लगातार परेशां करता रहा...

“क्या वो फैसला सही था”???