Monday, January 28, 2013

बस यूँ ही......

वो वक़्त जो बीत चुका है, गुजरता क्यूँ नहीं?
ये लम्हा जो मुश्किल से मिला है, ठहरता क्यूँ नहीं?
वक़्त अपनी ही रफ़्तार से चलता क्यूँ है?
कोई इल्तेज़ा कोई हुक्म सुनता क्यूँ नहीं??
 
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बस दो ही मसले हैं मेरी ज़िन्दगी में,
गुज़रे हुए वक़्त में मिले दर्द का हिसाब रखना,
आने वाले वक़्त की फिक्र में दिन गुज़ारना......
 
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मेरे और उसके बीच सबकुछ टूटा है....तो बस टूट ही गया,
बातों में भी अक्सर तल्खियां ही रहती है,
नज़रें बुझी हुई जुबां खामोश रहती है,
भूले से जो कभी नाम आ जाए मेरा...उसके होठों पर,
अपने ही दांतों से फिर होंठ काट लेता है अपनी,
चार बूँद आंसू के साथ निकल जाती है मेरी फिक्र उसके दिल से..
 
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अधजगी सी नीँद है, अधखुली सी आँखे,
अधूरा सा इश्क है अधूरी सी बातेँ....

Tuesday, January 22, 2013

सुकून

तुम्हारी आँख बचाकर करती रही हूँ बातें तुमसे,
बारहा तुम्हारे काँधे पर रखा है सर अपना,
बारहा तुम्हारे बालों में फेरी है उंगलियाँ मैंने,
तुम्हारी एक तस्वीर रखी है महफूज़ करके अपने आँचल में,
तमाम शब् गुजरती है उसको सीने से लगाए हुए,
जो ख्वाबों में भी आते हो, तो फासला दरमियान नहीं होता,
मेरे जीवन में तुम थे, बस एक तुम हो, तुम ही रहोगे,
तुम्हारे जाने की तारिख भी अब दर्ज नहीं मेरे केलेंडर में,
वो तमाम यादें जो दिलाती थी याद मुझको, तुमको खोने की,
वो तमाम वजहें ख़त्म कर के, मिटा दिया मैंने,
मुझे सुकून है, तुम हो यहीं हो मेरे पहलू में,
मेरी मुस्कान सच्ची है, तुम्हारा प्यार सच्चा था..

Wednesday, January 16, 2013

मुश्किल या मुमकिन

मुझे चले ही जाना था,
बिना कोई आवाज़ किये,
बिना तुम्हे रोके.......बिन टोके,
कि तुम्हारे चेहरे पर कोई भाव नहीं देखा मैंने,
कोई ख़ुशी, कोई उल्लास नहीं देखा मैंने,
जब चली आई थी मैं बेधरक तुम्हारे करीब,
तुम्हारी आँखों में झाँका था मैंने,
इस उम्मीद के साथ कि एक और बार बेकरारी का समा होगा,
मेरे साथ ये शाम भी जवां होगा,
तुम पकड़ लोगे मेरा दामन, मुझे रोकोगे,
मैं सिमट जाउंगी खुद में, फिर तुममे,
तुम्हारा साथ जैसे सांस भर जाती हो सीने में,
तुम्हारा प्रेम जैसे मरनेवाले ने ज़िन्दगी की एक बूँद चख ली हो,
तुम्हारी खामोशी जैसे सन्नाटे में धुंध की चादर सी फैली हो कोई,
चले जाना ही मुश्किल था, चले जाना ही मुमकिन था,
कुछ बातों का अधूरा छूटना बेहतर...

एक तेरी याद ही मुक़म्मल है।

बेतहाशा दौड़ते दौड़ते कभी अचानक ही रुक जाएं, तो समझ आता है,
कितना सही किया और कितना ग़लत,
कितने करीब आए...और करीब आने की चाहत में कितने दूर हो गए.......

तुम्हारा साथ जैसे तारों की झिलमिलाती दुनिया,
जैसे जहान के ग़म से दूर, ख्वाबों ख्यालों की दुनिया,
जैसे माँ की कहानियों का सच हो जाना,
जैसे बाली उमर में बुने गए सपनो का सच हो जाना,
जैसे बच्चों की कल्पनाओं में जान आ जाना, दिल का धडकना,
उम्र का आखिरी पड़ाव, मृत्यु सामने और जी जाएं एक पल को सोचकर कि तुम मेरे सिरहाने बैठे हो.....


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ये आभासी रिश्ते....पड़ जाते हैँ कमज़ोर एक दिन, ठीक उस दिन जिस दिन ख़त्म होने लगता है इनके बीच का खिचाव, पड़ जाती है ढीली पकड़, न आकर्शण बचता है न गर्मी बचती है, खो जाती है खुश्बू ऐसे, काग़ज़ के महज़ फूल होँ जैसे, सब बेमाने हैँ यहाँ, सब दिखावा है यहाँ, न दिल का जुड़ाव है, न खून का लगाव है, मात्र छल है, दिखावा है, झूठ है, बहलावा है....ये आभासी रिश्ते।

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मैँ तो असफ़ल ही रही हमेषा की तरह, कि टूटकर नफ़रत नही होती मुझसे, टूटकर प्यार किया था जिससे।

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ख़ामोश रात, घड़ी की टिकटिक, सर्द हवा, बोझिल पल्केँ, चंद साँसे...वो भी ठहरी हुयी.......ये सब आनी जानी है,................. एक तेरी याद ही मुक़म्मल है।

 

कुछ बातें

कुछ अनकही सी बातें,
कुछ अनबुझे से पल हैं,
मेरी उदासियों में,
सिमटा सा मेरा कल है..


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चंद अधूरे खाब,
चंद अधूरी ख्वाहिशें,
चंद ज़ख्मों की रवायत,
चंद उम्मीदों की आहट,
चंद साँसों की हरारत,
चंद उँगलियों का आपस में जुड़ना,
चंद पलकों का झुकके फिर उठना,
चंद यादों में जागती आँखें,
और खुद में सिमटी बाहें,
चंद तन्हाईयों से भरी शामें,
चंद दर्द से कराहती रातें..
चंद यादें.....चंद यादें...
 

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कांच चुभने लगी है आँखों में,
दिल में एक टीस सी उठी है अभी,
ग़म तेरा मुझको अब सताता है बहुत...


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हर मोड़ पर ठोकर लगी, हर राह मेँ दिल थर्राया,
हर शख्स नेँ छला मुझको, तब जा के मुझे जीना आया।

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हकीक़त की ज़मीन से ख्वाहिशों के आसमान तक,
फेरे लगाए, बहुत दूर चले आए,
तेरे आहट से जो होती थी दिल की धड़कने तेज़,
सांस भर जाती थी अक्सर फिर सीने में,
उन्ही सिमटे हुए साँसों की क़सम,
तेरे बिन आज चंद सांस को तरसते हैं हम,

औंधे मुह गिरते हुए कभी ख्वाहिशों को देखा है???


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न साल नापे हैं, न उम्र गिनी है,
तुझसे बिछड़ने के बाद, सिर्फ इंतज़ार किया है.

 

Friday, January 11, 2013

‘प्यार’

उसने अपनी पोटली में अनगिनत बहाने छिपा रखे थे, जब भी जरा सा जी उकताता उसका रोज़मर्रा की बातों से, एक बहाना निकाल...खुल के मुस्कुरा लेती ..मैंने उसके चेहरे पर उदासी कभी देखी नहीं

कि जबसे उसने किनारा कर लिया, उस हर ‘अपने’ से जो अपना होने का दंभ भरते थे, उसकी शादी के दिन भी वो रोई नहीं, उसको कोई ग़म न था माँ बाप से बिछड़ने का, उसने अपने पति का देखभाल और अपनी बेटी का पालन पोषण किया पर उम्मीद नहीं की, कहती थी, ‘मुझे किसी से कोई उम्मीद नहीं, मैंने सिर्फ फ़र्ज़ निभाना जाना है, उम्मीदें दिल को बस तोड़ना  जानती हैं, उम्मीदें बेआबरू, बेआसरा कर छोडती हैं’,
रश्मि शादी के पहले किसी से प्यार करती थी, बेपनाह प्यार, कहती थी, ‘कोई ज़रूरी नहीं कि आप जिससे प्यार करते हैं उस से मिलते जुलते रहे, वो दूर है तो क्या हुआ मेरे दिल में उसके लिए बेपनाह प्यार है’, राहुल के नाम से भी शर्मा जाया करती थी, वो उसे अपने तब मिला था जब वो अपने रिश्तेदार की शादी में आया हुआ था, वो एक शांत, पर तीखी नज़र का लड़का था, जितना ही सभ्य और शालीन था, उतना ही समझदार और खूबसूरत भी, सांवला सा चेहरा, छह फिट की हाइट, बड़ी बड़ी आँखें, ऐसी शक्सियत से भला कौन न प्रभावित होता, उस शादी में हर लड़की के लब पर बस एक ही नाम था ‘राहुल’, पर राहुल की नज़रें उस लड़की पर जा टिकी जो उन सब में सबसे अलग थी, दिखने में कुछ ख़ास न थी, पर जब हंसती तो उसे देखनेवालों के चेहरे पर भी मुस्कान बिखर जाती, राहुल पर भी उसका असर हुआ, राहुल ने जाते जाते, उसके हाथ में एक चिट्ठी थमा थी, और उस रोज़ के बाद से कुल जमा तीन काम थे उसके पास, सुबह उठकर राहुल की तस्वीर देखना, दिन भर डायरी में राहुल के साथ गुज़रे उन ‘दो दिनों’ को सौ बार लिखना, और रात होते ही राहुल की तस्वीर आँखों में सजाए सो जाना, न घरवालों की परवाह थी, न अपने भविष्य की फिक्र, पर किसी ने कहा है न कि ख्वाबों की  दुनिया में जीने वाले अक्सर हकीक़त की ज़मीन पर औंधे मुह गिरते हैं....माँ बाप के सामने जिस दिन अपने एहसास ज़ाहिर किये, माँ बाप ने साफ़ इनकार कर दिया, घर छोड़ वो उस शहर में आ गयी जहाँ राहुल था लेकिन................वो राहुल, जिसके साथ उसने सुनहरे भविष्य के सपने देखे थे, एक शांत, समझदार, मासूम सा लड़का जिसकी तस्वीर रश्मि की आँखों में रहा करती थी, जब पूरे पांच साल बाद रश्मि..राहुल से मिली तो वो...वो न था, वो कुछ और ही था, इन्फेक्ट रश्मि को तो पहली झलक में वो ठीक से पहचान भी न सका, उसने राहुल को बार बार याद दिलाया, गुहार लगाई, मिन्नतें की, कि वो उसे इस तरह न ठुकराए, प्यार में कहाँ याद रहता है किसी को सेल्फ रेस्पेक्ट, रश्मि भी सबकुछ भूल चुकी थी बस एक अंतिम आस थी के शायद...........................! लेकिन आखिर वही हुआ जो अक्सर इस तरह की कहानी के अंत में होता है, प्यार में धोका मिला, दिल टूट गया, और फिर माँ बाप के जिद्द पर घुटने टेक दिए रश्मि ने.............

हाँ, कहानी थोड़ी फिल्मी है पर रियल है, उस लड़की को मैं जानती हूँ, वो जब भी मिलती है मुझसे, खुलकर हंसती है, मुस्कुराती है, कोई शिकन नहीं देखा उसके चेहरे पर, पर वो चंचलता, वो अल्ल्हड़पन अब उसमें शेष नहीं, उसकी हंसी में जैसे एक ब्रेक सा लग जाता है, यदि कोई उस लफ्ज़ का ज़िक्र भी कर दे जिसे कहते हैं ‘प्यार’

Wednesday, January 9, 2013

मुझे है याद वो सब जो कभी हुआ ही नहीं.....................................

यूँ भी कई बार हुआ है कि मैं आई हूँ घर लौटकर ऑफिस से, और माँ ने बनाए हैं गर्म पकौड़े और लिए आई है वो कमरे में जहां बैठी हूँ मैं अपने बाबूजी के साथ, और सुना रही हूँ सुबह से शाम तक हुए हर वाक़ये के बारे में, हम तीनो हंस रहे हैं, और मैं एक पल को ठहर जाती हूँ अपने बाबूजी का हँसता चेहरा देखकर, उनके चेहरे पर निश्चिंतता है, गर्व है कि वो मेरे पिता है...

और कभी यूँ भी हुआ है कि मेरी शादी का दिन तय हुआ और मेरे बाबूजी अपने व्यस्त समय में से ज़रा  सा समय निकालकर आए हैं मेरे पास और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा उन्होंने, आज तुझे मुझसे दूर जाना है, तू जानती है कि तेरे बगैर एक दिन भी जीना मुश्किल है मेरे लिए मेरी लाडली, पर यही जीवन है, ज़िन्दगी में हमेशा खुश रहना और ख़ुशी ही बांटना, तू जब जब मुस्कुराएगी मुझे मालूम चल जाएगा, और मैं भी खुश होऊंगा, ज़्यादा याद आई तो सबकुछ छोड़ तेरे पास जाऊंगा, जितना प्यार मैंने और तेरी माँ ने दिया है तुझे उसे तुझे आगे सबपर न्योछावर करना है, अबतक तेरे अधिकार’ की ज़िन्दगी थी, अब तेरे कर्तव्य’ की ज़िन्दगी होगी, मेरी डोली उठ रही है और मेरे बाबूजी की आँखों में आंसू है, मैं दौड़कर लौट आती हूँ, मेरे पिता मुझे गले लगाकर मुझे सँभालते हैं और फिर थमा देते हैं मेरा हाथ मेरे पति के हाथों में..............

और कभी यूँ भी हुआ कि मेरी छोटी सी बिटिया को बिठाए वो अपनी पीठ पर बने हैं घोड़ा, मेरी बेटी की किलकारियां और मेरे बाबूजी की हंसी से सबकुछ हुआ है जीवंत, हमसब खुश हैं....

मुझे है याद वो सब जो कभी हुआ ही नहीं.....................................

Monday, January 7, 2013

कल्पना या सत्य!............मेरे बाबूजी

वो हँसते तो यूँ लगता, जैसे ज़िन्दगी मुस्कुरा रही हो, जब कभी वो पढ़ाते वक़्त गुस्से से देखते तो उनकी बड़ी बड़ी आँखें और भी बड़ी हो जाती, हल्की लालिमा झाँका करती थी उनकी आँखों से, और माँ से कहते आपकी बेटी मुझसे नहीं संभलती अब, बेहद शरारती हो गयी है, पढ़ाई में मन ही नहीं लगता इसका, और माँ कहती , आप ही ने बिगाड़ा है इसे, और चढ़ाइए सर पे....माँ बाबूजी की नोकझोक और दीदी की हंसी ही मेरी ज़िन्दगी थी, मुझे हर दिन खूबसूरत लगता था, सुबह सुबह बाबूजी पेपर और अन्य किताबों से घिर जाते, सुबह कोई तीन साढ़े तीन बजे वो उठा करते थे, छोटे से शहर में मच्छरों का बोलबाला रहता, और बाबूजी के तौलिये के सधे हुए निशाने की चपेट में वो अमूमन ही जाते थे, दीदी चाय बनाती और फिर माँ बाबूजी और दीदी साथ बैठकर चाय पीते, करीब सात बजे तक में दो प्याली चाय और ढेर सारी बातें होती थी उनसब के बीच, तब कहीं जाकर मैं चादर से अपना मुह निकालती तो देखती बाबूजी मेरे सर के पास ही खड़े हैं, और घूम रहे हैं इधर से उधर, और माँ को बोल रहे हैं, पूरी हाथ से निकल गयी है ये लड़की, कहाँ तो बच्चे सुबह सवेरे उठकर पढ़ाई करते हैं, सुन रही हैं आवाज़ वो मिश्रा जी की बेटी की आवाज़ है, रोज़ सवेरे उठकर पहाड़ा याद करती है, और इन्हें देखिये नींद ही पूरी नहीं हुई इनकी अबतक'............इतनी बातें सुनकर कौन उठ जाए, मैं भी सर झुकाए उठती फिर बाबूजी के ऑफिस जाने के वक़्त तक किताब में सर गाड़े रखती, और मन ही मन उस नीतू को गालियाँ देती, कमबख्त एक साल से वो ही दो से बीस’ तक के पहाड़ों में उलझी है, और इतनी ज़ोर ज़ोर से याद करती है के मेरे घर तक उसकी आवाज़ बेरोक टोक आती है, पर ये सब तो रोज़ का ही रूटीन था, किसी भी हाल में गुस्से की वजह कोई भी हो, मेरे बाबूजी कभी नहीं होते, मैं जब भी उनके बारे में सोचती एक हल्की सी मुस्कान चेहरे पर दौड़ जाती.........मुझे अब भी याद है जब मैं एक बार बेहद बीमार पड़ी थी, और रात के कोई दस बजे मैंने संतरे खाने की जिद्द की थी, उस ठिठुरती ठण्ड में किस तरह वो गए थे इतनी दूर पैदल चलकर, हाँ उनके स्कूटर में पेट्रोल नहीं था, पर संतरे उनकी लाडली बेटी को चाहिए थे, तो लाते कैसे नहीं भला! जाने कितनी बार यूँ भी हुआ कि मैं शाम ढलते ही सो गयी, और रात को खाने पर जब माँ ने उठाया तब जागी नहीं, यूँ तो बाबूजी के सोने का वक़्त निश्चित था, पर जब भी मैं बगैर खाना खाए सो जाती, वो रसोईघर में माँ के पास खड़े होकर मेरे लिए पराठे बनवाते, वो जानते थे के पराठे के नाम पर मैं उठ जाउंगी........अक्सर रात को सोते वक़्त जब वो अपने बिस्तर पर चले जाते तो मुझे आवाज़ देते और कहते ज़रा आओ यहाँ मेरे पैर दबा दो, अमूमन ये तब होता जब वो देखते कि मैं बड़ों की बातों में इंटरेस्ट ले रही हूँ, मेरा मूह उतर जाता, और मैं चुपचाप उनके बिस्तर पर बैठ उनका पैर दबाने लगती, जिसमें उनका पैर कम दबता और मैं हिलती ज्यादा थी, बीच बीच में डांट भी पड़ती थी, फिर जाने कब वहीँ सो जाती, और फिर माँ मुझे गोद में लेकर मेरे कमरे में पंहुचा देती, मुझे अब भी याद है जब मुझे मैट्रिक  की परीक्षा में अच्छे मार्क्स आए थे, तो वो किस कदर खुश थे, हर मिलने जुलनेवाले को गर्व से बताते रहे, कि मेरी बेटी को मुझसे भी बेहतर मार्क्स आया है........

उनके चेहरे पर मुस्कान बनी रहती थी, पान खाया करते थे वो शौख से, पर जिस दिन डॉक्टर ने कहा ‘आपको पान छोड़ना होगा, उन्हें एक मिनट भी नहीं लगा, कि पान का डब्बा उठाकर फेक दिया, वो जितने ही खुशमिजाज़ थे, उतने ही जिंदादिल, जितने ही स्वाभिमानी उतने ही परमार्थी.........वो बहुत ख़ास थे, वो अब भी बहुत ख़ास हैं, वो दीखते नहीं पर अब भी हैं मेरे दिल के सबसे महफूज़ कोने में .................