Thursday, August 22, 2013

प्यार बिना ज़िन्दगी लोग कैसे काटते होंगे जाना!

...उस रोज़ क्या हुआ था याद है? उस शाम जब सूरज काले बादलों के पार छिप गया था, मैं कैसी बावली सी चली आई थी टेरिस पर और तुम्हारे कई बार आवाज़ देने पर जब लौटी, तुमने खूब डाटा था, और कहा था,
‘ऐसा मासूम सा चेहरा बना लेती हो कि डांटनेवाले को आप ही शर्मिंदगी हो जाए...’
और मैं सर नीची किये चली आई थी कमरे में, कपडे बदल कर जब वापस आई तो तुम अदरख तुलसी वाली चाय लिए बालकनी में मेरा इंतज़ार कर रहे थे.. हम अक्सर शाम की चाय बालकनी में उस झूले पर बैठकर ही पिया करते थे, अरे हाँ, वो झूला भी तो मेरी जिद्द का नतीजा था....
याद है जब पहली बार तुमने मुझे गले लगाया था किस तरह बेचैन थे हम कई महीनो से कभी मौका ही न मिलता, जब भी बात होती तुम बस इतना ही कहते,
‘ये रस्म कब ख़त्म होंगे, मुझे तो लगता है मैंने तुमसे नहीं बल्कि इन रस्मों और बंदिशों से शादी की है’...
और इतने इंतज़ार के बाद जब पहली बार मौका मिला करीब आने का और तुमसे मैंने पूछा कि...
’सुनो...ये क्या था? ये इतनी अजीब सी बेचैनी क्यूँ थी जी? और अब अचानक ये सुकून कैसा?
तो तुमने हौले से मेरे कानों में क्या कहा था...याद है?? तुमने कहा था,
‘जान, इसे आलिंगनबद्ध होना कहते हैं’
इतनी शुद्ध हिंदी में उस वक़्त जब तुमने कहा तो मुझे बेहद हंसी आई...और हँसते हँसते जब मेरा चेहरा लाल हो गया तो चूम लिया था तुमने मेरी पेशानी को, और कहा था...
‘बस इतनी सी ही सांस  और मिल जाए.. कि तुम जबतक हो मैं तुम्हे मुस्कुराने की वजह देता रहूँ.....’

हमारे साथ को आज पूरे पंद्रह साल हो गए, पर आज भी सब बस कल की ही बात लगती है, वक़्त कई बार हावी हुआ हमपर पर उम्र नहीं...सच....प्यार बिना ज़िन्दगी लोग कैसे काटते होंगे जाना!